Savitri – A Legend and a Symbol

The tale of Satyavan and Savitri is recited in the Mahabharata as a story of conjugal love conquering death. But this legend is, as shown by many features of the human tale, one of the many symbolic myths of the Vedic cycle. Satyavan is the soul carrying the divine truth of being within itself but descended into the grip of death and ignorance; Savitri is the Divine Word, daughter of the Sun, goddess of the supreme Truth who comes down and is born to save; Aswapati, the Lord of the Horse, her human father, is the Lord of Tapasya, the concentrated energy of spiritual endeavour that helps us to rise from the mortal to the immortal planes; Dyumatsena, Lord of the Shining Hosts, father of Satyavan, is the Divine Mind here fallen blind, losing its celestial kingdom of vision, and through that loss its kingdom of glory. Still this is not a mere allegory, the characters are not personified qualities, but incarnations or emanations of living and conscious Forces with whom we can enter into concrete touch and they take human bodies in order to help man and show him the way from his mortal state to a divine consciousness and immortal life.

– SRI AUROBINDO

2 thoughts on “Savitri – A Legend and a Symbol

  1. श्री अरविंद के ग्रंथों में सर्वाधिक महत्व का सावित्री महाकाव्य है। यह उनकी अंतिम तथा समन्वित योग के सार तत्व की रचना है। अंग्रेजी भाषा का यह सबसे विशिष्ट महाकाव्य माना जाता है। अमेरिका में सायराकूसविश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा.पाइपर ने इस ग्रंथ के विषय में अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए हैं। इस महाकाव्य ने नवयुग की ज्योति का शुभारंभ कर दिया है। अंग्रेजी भाषा का यह सबसे विशिष्ट महाकाव्य है।

    वस्तुत:सावित्री मनुष्य के मन को विस्तृत कर परम स्वयंभू तक ले जाने के लिए सबसे शक्तिशाली कलात्मक रचना है। यह विशाल है, भव्य है तथा इसमें रूपकों का चमत्कार है। मनुष्यों की पीढी दर पीढी इन निरंतर स्रोत से अपनी आत्मा का अमृतपानकरती रहेगी।

    इसका कथानक श्री अरविन्द ने महाभारत से लिया तथा सावित्री और सत्यवान की प्रसिद्ध कथा को लेकर मनुष्य की मृत्यु पर विजय दिखाई है। उनके ही शब्दों में-सावित्री सूर्यपुत्री है सर्वोच्च सत्य की देवी है। सावित्री का पिता अश्वपति तपस्या का अधिपति है। सत्यवान का पिता द्युगत्सेनदिव्यमनहै। वस्तुत:यह कथन रूपक मात्र नहीं है। न इसके पात्र ही मानवीय गुणों वाले ही हैं वरन् वे सजीव और चेतन शक्तियों के अवतार और विभूतियां हैं। श्री मां ने सावित्री के विषय में जो कुछ कहा है वह इस प्रकार है-उन्होंने सारे विश्व को एक पुस्तक में उतार लिया है। यह अद्भुत, भव्य और अद्वितीय पूर्णता से भरी हुई रचना है। श्री अरविन्द का योग वैज्ञानिक है। भोग सत्य का एक छोर है तो वैराग्य दूसरा। संपूर्ण सत्य वह है जो दोनों को अपने भीतर समाहित करता है और फिर दोनों से आगे निकल जाता है। सावित्री इसी तथ्य का दिग्दर्शन कराती है। डारविनका विकासवाद अधूरा है। क्या प्रकृति अब आगे कोई रचना नहीं करेगी! विकास का रथ रुक जाएगा? नहीं। अब प्रकृति मानव के भीतर अतिमानव की संभावनाएं तलाश रही है। श्री अरविन्द का समन्वित योग मानव को अतिमानव तक पहुंचाना है। इसी के निमित्त उनकी योग साधना थी। अतिमानवी चेतना मनुष्य के मन के भीतर छिपी हुई है। अब वह प्रकट होने के समीप है। मनुष्य अगर साधना पूर्वक उस चेतना को ग्रहण करने का प्रयास करे तो अतिमानसीचेतना अवश्य उत्तीर्ण होगी। प्रकृति के पीछे जो विश्वात्मा विराजमान है उसके साथ अभिन्नता स्थापित कर अनन्त शक्ति से शक्तिमान होना है। मनुष्य के अंदर जो सुप्त देवता विद्यमान है उसको जागृत कर मनुष्य का रूपान्तर साधित करना होगा। पृथ्वी की अन्तर्निहित विराट चेतना को उद्बुद्ध कर यहीं पर स्वर्ग राज्य को स्थापित करना होगा। इस महान ग्रंथ का काव्यानुवादमहान कवयित्री विद्यावती कोकिल ने हिंदी में किया है इसी से यह हमें उपलब्ध है।

    साभार:- डा. सरोजिनी कुलश्रेष्ठ

  2. श्री अरविंद आध्यात्मिक विज्ञान में एक क्रन्तिकारी अनुसन्धानकर्ता के रूप में उससे भी कहीं अधिक उत्तम स्थान रखते हैं जो कि भौतिक विज्ञान में अल्बर्ट आईंस्टीन का है ! श्री अरविंद ने आईंस्टीन के भौतिक विज्ञान की तरह आध्यात्मिक विज्ञान का स्वरुप ही बदल दिया ! इन्होंने अभूतपुर्व अतिमानस की संकल्पना के बारे में आधुनिक जगत को अवगत कराया !

    श्री अरविंद ने अपने अनुसन्धान के द्वारा जीवन के इस विभाजन और विखंडन का निराकरण करके जीवन को पुनः समग्रता का आधार प्रदान किया है और इस समग्र चेतना को, सुपर चेतना को, ‘सुपर माईंड’ या ‘अतिमानस’ का नाम दिया. सुपर माईंड की समग्र चेतना न केवल भूतकाल की मानव जीवन की विसंगति का अंत करती है बल्कि भविष्य के लिए एक नये मानवेतर दिव्य जीवन का भी आरम्भ करती है यह श्री. अरविंद के ऐतिहासिक अनुसन्धान का परिणाम है.

    सन १९५८ में जब विनोबा जी पोंडिचेरी में माँ (the Mother ) का आशीर्वाद लेकर लौटे तो सर्वोदय कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि अतिमानस के रूप में पृथ्वी के ऊपर नये सत्य का उदय हो रहा है. यदि हमें नये भविष्य का निर्माण करना है तो मन से ऊपर उठ कर इस सत्य को अपने अन्दर धारण करना होगा. यदि हम ऐसा नहीं कर पाते तो हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि परमेश्वर इस सृष्टि का विनाश करना चाहते हैं. (विनोबा जी का यह कथन पवनार से प्रकाशित “मैत्री पत्रिका” में भी छपा था. )

    विनोबाजी की यह उक्ति कि “जीवनम सत्य शोधनम” तो सर्व विदित ही है. श्री. अरविंद की स्थिती और अनुसन्धान की तथा विनोबा जी की सर्व विदित उक्ति के अनुभव के आधार पर मेरा भी इन दोनों से आकर्षण रहा है.

    सुपर माईंड के रूप में पृथ्वी को उसका आत्मोदय प्राप्त हो गया है. सुपर माईंड पृथ्वी की आत्मा का नाम है. इस आत्मोदय ने पृथ्वी को वस्तु से व्यक्ति याने dead thing से living being बना दिया है. उससे आत्मोदय से सर्वोदय का रास्ता साफ़ हो गया है. प्रकृति के उद्धार का मार्ग प्रशस्त हो गया है. It is radical new dimension of life and existence and that only fulfills the aspirations of Gandhi ji and Vinobaj ji.

    श्री. अरविंद ने आईंस्टीन की तरह भावी जगत का एक सूत्र दिया है. जिस प्रकार आईंस्टीन के सूत्र को लेकर आज के युवा वैज्ञानिकों ने एक महल की रचना कर डाली है उसी प्रकार हम को यानि Post Aurobindonian Spiritual Scientists को super-mind का सूत्र अप्लाय करके एक नये जीवन और जगत की सृष्टि करनी होगी. इसके लिए एक appropriate technology का पहले अनुसन्धान करना होगा.

    साभार :- कृष्णराज मेहता जी.

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