परम ऋत ( ऋतम् ) का तत्वज्ञान : 3

‘ऋत’ एक वैदिक अवधारणा है जो बहुत ही गूढ़ है। सरल शब्दों में कहें तो समूची सृष्टि जिस एक व्यवस्था के भीतर/द्वारा संचालित है, वह ऋत है। ईश्वर की पूर्ववर्ती अवधारणा होते हुए भी ऋत की अवधारणा ईश्वर का अतिक्रमण करती है। सनातन विचारधारा ऋत संचालित थी। जीवन और सृष्टि के हर प्रश्न और हर समस्या को इस विराट के प्रकाश में ऋषियों ने समझा और उत्तर देने के प्रयास किए।

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“संशय निकष का ऋत का भी”, यह पंक्ति नरेश मेहता रचित ‘संशय की एक रात’ खंड काव्य में आई है। राम पूरी सेना लेकर लंका पहुँच चुके हैं और अगला दिन युद्ध के प्रारम्भ का दिन है। राम युद्ध के पहले की रात युद्ध की सार्थकता, उसके प्रयोजन, मानव सभ्यता के संकट जैसे प्रश्नों से जूझते हैं। यह रात उनके लिए यातना की रात साबित होती है।

निकष माने कसौटी। कसौटी पत्थर पर सोने की शुद्धता की जाँच होती है। वह सोना जो संसार की सबसे मूल्यवान धातु है, प्रतिदिन एक पत्थर पर कसी जाती है, परखी जाती है। 

संशय करो, प्रश्न करो चाहे सामने ‘ऋत’ ही क्यों न हो।

ईश्वर की पूर्ववर्ती अवधारणा होते हुए भी ऋत की अवधारणा ईश्वर का अतिक्रमण करती है। ऋत के विराट स्वरूप से तुलना करें तो लगता है कि ईश्वर की ‘खोज’ एक पिछड़ा कदम है क्यों कि यह संशय और प्रश्न को नेपथ्य में डाल देता है।

सनातन विचारधारा ऋत संचालित थी। जीवन और सृष्टि के हर प्रश्न और हर समस्या को इस विराट के प्रकाश में ऋषियों ने समझा और उत्तर देने के प्रयास किए।

इस प्रयास की प्रक्रिया में सामने आता है – संशय । संशय से प्रश्न उठते हैं और उनके हल तलाशने की प्रक्रिया में समाधान के साथ ही उठते हैं – नए संशय । संशय से पुन: प्रश्न …… प्रक्रिया चलती रहती है और चिंतन का विकास होता जाता है। जाने अजाने ऋत संचालित होने के कारण समूची भारतीय सोच में एक सूक्ष्म सा तारतम्य दिखता है। साथ ही यह इतनी सार्वकालिक होती जाती है कि आज की ज्वलंत समस्याओं जैसे पर्यावरण आदि से जुड़े प्रश्नों पर भी विचार इसके प्रकाश में हो पाता है।

बार बार अपनी विराट खोज ‘ऋत’ पर भी संशय कर के भारतीय सोच जहाँ एक ओर प्रगतिशील होती रही, वहीं मानव की मेधा के प्रति सहिष्णुता की भावना भी संघनित होती रही। संवाद की इस परम्परा के कारण वेदों में वृहस्पति की नास्तिकता जैसी सोच को भी स्थान मिला। ऋग्वेद के प्रसिद्ध नासदीय सूक्त की केन्द्रीय अवधारणा ‘कस्मै देवाय हविषा विधेम’ से विकसित होती हुई यह संशय और खोज की परम्परा नेति नेति, उपनिषदों के प्रश्न उत्तर, बुद्ध के ‘अत्त दीपो भव’ , जैनियों के स्यादवाद और शंकर के वेदांती ‘अहम ब्रह्मास्मि’ तक आती है। किसी अंतिम से दिखते समाधान को भी संशय और प्रश्न की कसौटी पर कसने के उदाहरण हमारे महाकाव्यों में भी दिखते हैं राम पूरी सेना को उतार कर भी अंगद को दूत बना कर भेजते हैं तो कृष्ण शांतिदूत बन कर कौरवों के यहाँ जाते हैं और एकदम युद्ध प्रारम्भ होने के पहले युद्ध भूमि में भी गीता के प्रश्नोत्तर में भाग लेते हैं। बुद्ध हमें संशय और प्रश्न के लिए इस सीमा तक उकसाते हैं कि कहते हैं कि मेरी बात भी बिना प्रश्न किए न मानो। जैन धर्म अन्धे और हाथी के प्रसिद्ध उदाहरण द्वारा सत्य की पहचान को नया आयाम देता है।

सारांश यह है कि भक्ति आन्दोलन द्वारा ईश्वर के आगे सम्पूर्ण समर्पण के पहले भारतीय विचारधारा इतनी विकसित हो चुकी थी कि अगली तार्किक परिणति यही होनी थी। ऋत की विराट परिकल्पना पतित होकर ईश्वर की सर्व सुलभ समझ में प्रतिष्ठित हुई और उसके आगे सम्पूर्ण समर्पण ही एक मात्र राह दिखाई गई। जन के लिए यह आवश्यक था लेकिन इससे हानि यह हुई कि संशय और प्रश्न नेपथ्य में चले गए। इसके कारण धीरे धीरे एक असहिष्णु मानस विकसित हुआ। विभिन्न पंथों के कोलाहल में मूल मानव कल्याण के विमर्श खो गए। इस्लाम जैसे असहिष्णु, संकीर्ण, संशय तथा प्रश्न विरोधी और हिंसक पंथ के आगमन, विजय और विस्तार ने तो जैसे इस प्रक्रिया पर मुहर ही लगा दी। अकबर या दाराशिकोह वगैरह के दरबारी टाइप प्रयास कृत्रिम थे, इनमें कोई स्वाभाविकता नहीं थी, लिहाजा कट्टरता विजयिनी हुई।

आज संशय और ऋत की पुनर्प्रतिष्ठा की आवश्यकता है, जो बस मानव मेधा की सतत प्रगतिशील और विकसित होने की प्रवृत्ति को मान दे और उसका पोषण करे। बर्बर खिलाफती, तालिबानी,प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी सोच के विरुद्ध यह सोच निश्चय ही सफल होगी।

साभार:- http://goo.gl/Va6tLA 

श्रीमद गीता में कहा गया है :

यो यो यां यां तनुं भक्त: श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम।।

जो भक्त जिस रूप में जिस देवता की श्रद्धा से उपासना किये करते हैं, उसको मैं उसी श्रद्धा को स्थिर कर देता हूँ। भिन्न भिन्न देवताओं की जो पूजा की जाती है वह र्इश्वर की ही पूजा है तथा उस का फल भी र्इश्वर द्वारा ही दिया जाता है। क्योंकि इस जगत में र्इश्वर के अतिरिक्त कुछ हैं ही नहीं। वेदान्त तथा उपनिषद में भी यही भाव है। बलिक उस से भी पहले वेद में भी इसी सिद्धाँत को प्रतिपादित किया गया है।

ऋगवेद में ही कहा गया है – एकं सदविप्र बहुधा वदन्ती। और – पुरुष एवेदं सर्वं यद भूतम यत्छा भावयम। पुरुष ही यह सब कुछ है, था और होगा। ऋगवेद में ही ऋत की कल्पना की गर्इ हैं क्योंकि यह स्पष्ट था कि सूर्य चन्द्रमा इत्यादि स्वेच्छाचारी नहीं हैं। वह अपने मन से कार्य नहीं करते वरण किसी नियम से बंधे हैं। इसे ऋत को नाम दिया गया। ऋत ही सर्वोपरि माना गया। लेकिन फिर इस ऋत का भी स्वामी है। ”वह ही ऋत का संरक्षक है। पूरे ब्रह्मांड को बाँधने वाला है। पूरे विश्व का तथा पूरे नैतिक सदाचार का आधार है। अर्थव वेद में कहा गया है ”तमेव विदित्वा तिमृत्युमेती नान्य: पंथा विद्वते अनन्या । उसी एक को जानने से ही मुत्यु से पार पाया जा सकता है। और कोर्इ रास्ता नहीं है।

सृष्टि का एक अटल नियम है वेदों ने इसे ऋत की संज्ञा दी है। ऋत का अर्थ है ईश्वर का स्वभाव या दूसरे अर्थो में सृष्टि संचालन का नियम है। एक निश्चित व्यवस्था में अखिल ब्रह्मांड का संचालन हो रहा है। पृथ्वी अपने अक्ष पर सूर्य के चारों ओर एक निर्धारित कक्षा में भ्रमण कर रही है। अन्य ग्रहों, उपग्रहों इत्यादि का भी भ्रमण मार्गत्व वक्रत्व ग्रहण तथा उदय अस्त होना एक निश्चित प्रक्रिया में है। जिसका सटीक पूर्वानुमान ज्योतिषीय ज्ञान द्वारा शताब्दियों से किया जा रहा है। यह कुछ ऐसे तथ्य हैं कि एक निश्चित तथा व्यवस्थित विधान को स्वीकार करने के लिए बाध्य करते हैं। (vedeye.com)

सूर्य का उगना और अस्त होना नियमों में है; चंद्र का उगना, बढ़ना और पूर्णिमा होना फिर घटते हुए अमावस्या हो जाना प्रतिबद्ध नियमों में है. आकाश में मेघों का आना, वष्रा करना या न करना, वष्रा से पृथ्वी पर हरीतिमा आना नियमों में है. हमारा-आपका जन्म लेना, तरुण और वृद्ध होकर न रहना भी नियमानुसार है. वनस्पतियों का उगना, मुस्कराना, फूल देना, खिलना, बीज होना फिर बीज के भीतर उसी सारी गतिविधि का स्वचलित, समयबद्ध केंद्रीय यंत्र होना भी विस्मयबोधक नियमबद्धता है. छोटे से बीज के भीतर पेड़ होकर पुष्प और बीज देने की स्वचालित ऊर्जा आश्चर्यजनक है. प्रकृति का अपना संविधान है. ऋग्वेद के ऋषियों ने प्रकृति के इस संविधान को ‘ऋत’ कहा. ऋत बड़ी प्रीतिकर अनुभूति है. ऋषि प्रकृति की शक्तियों को अनेक नाम देते हैं. इंद्र हैं, अग्नि हैं, जल, पृथ्वी और आकाश हैं, मरुद्गण हैं. ऋषि उन्हें नमस्कार करते हैं. सबसे ताकतवर देवता हैं- वरुण. वरुण राष्ट्रपति और न्यायपालिका जैसे है. वे प्रकृति के संविधान-ऋत नियमों के संरक्षक हैं. मरुद्गण वायु देव हैं. वे भी नियमों में ही गतिशील हैं. वे नियमों के ज्ञाता भी हैं.

ऋत नियमों से बड़ा कोई नहीं. अग्नि प्रकृति की विराट शक्ति हैं. वे भी ‘ऋतस्य क्षत्ता’ हैं. नदियां भी ऋतावरी हैं. नियमानुसार बहती हैं. प्रकृति की शक्तियां इसी संविधान के अनुशासन में हैं. वरुण इसी अनुशासन के देवता हैं. धरती और आकाश वरुण के नियम से धारण किए गए हैं. यहां ऋत नियम का धारण करना धर्म है. सूर्य तेजस्वी हैं. वे जगत् की ऊर्जा का स्रोत हैं लेकिन नियमों से परे नहीं. ऋग्वेद में वरुण ने ही सूर्य का मार्ग निर्धारित किया है. यह हुआ ऋत पालन कराना, लेकिन सूर्य ने नियम माना तब यह हुआ उनका धर्म. ऋत और धर्म लगभग पर्यायवाची हैं. ऋत जब कर्म बनता है तब धर्म. ऋत मार्गदर्शक संविधान है, तदनुसार कर्म धर्म हैं. विष्णु ऋग्वेद के बड़े देवता हैं. वे धर्म धारण करते तीन पग चलते हैं. यहां सूर्य भी ‘धर्मणा’ हैं. सविता अंतरिक्ष और पृथ्वी को अपने धर्म के कारण प्रकाश से भरते हैं. जो ऋत है, वह सत्य है, ऋत और सत्य का अनुसरण धर्म है. इसलिए ऋत सत्य और धर्म पर्यायवाची भी हैं. प्रजापति इसीलिए ‘सत्यधर्मा’ हैं. सूर्य भी सत्यधर्मा कहे गए हैं.

प्रकृति की सभी शक्तियां ऋतबद्ध धर्म आचरण करती हैं तो मनुष्य का आचरण भी ऋत आबद्ध होना चाहिए. ऋत सत्य है, दैनिक जीवन में मनुष्य की कार्रवाई का आधार है बोली. इसलिए मनुष्य को सदा सत्य ही बोलना चाहिए. ऋग्वैदिक समाज से लेकर उत्तरवैदिक काल तक झूठ के लिए ‘अनृत’ शब्द आया है. अनृत का अर्थ है- जो ऋत नहीं. यहां ऋत ही बोलने के संकल्प हैं. तैत्तिरीय उपनिषद् में कहते हैं- ऋतं वदिष्यामि, सत्यं वदिष्यामि. लेकिन सत्य का बोलना ही काफी नहीं है, उसका आचरण भी जरूरी है. जो प्रत्यक्ष है, यथार्थ है, वह बेशक सत्य है लेकिन मूल सत्य इसके परे भी है. ऋग्वेद में ऋत का प्रयोग ज्यादा है, धर्म का कम. उत्तरवैदिककाल में धर्म, सत्य और व्रत (संकल्प) का उपयोग ज्यादा है ऋत का कम. ऋत धर्म के लिए व्रत संकल्प जरूरी हैं.

ऋग्वेद की ऊषा व्रत के अनुसार गति करती हैं. यहां व्रत ऋत का ही पर्याय है लेकिन इनमें हम सबके लिए व्रतनिष्ठ होने की प्रेरणा है. व्रत का अर्थ भूखे रहना कतई नहीं है. अन्न जरूरी है. तैत्तिरीय उपनिषद् में कहते हैं- अन्न का त्याग न करना ही व्रत है. अन्न उपजाना भी एक व्रत है. इसी तरह अतिथि सत्कार भी एक व्रत है. ऋत, सत्य, प्रकृति की कार्यवाही हैं और व्रत धर्म मनुष्य का आचरण. ऋषियों ने अपनी यही आकांक्षा देव चरित्रों में भी व्यक्त की है. कठोपनिषद् का नचिकेता युवा है. वह सत्यनिष्ठ है लेकिन धर्म के यथार्थवादी रूप को जानता है. धर्म संपूर्णता के प्रति मनुष्य का सत्यनिष्ठ आदर्श व्यवहार है. प्रकृति की नियमबद्धता संगीतमय मधुमयता है. राजनीति इस नियमबद्धता का पालन नहीं करती. दुर्भाग्य से यहां आदर्श आचार संहिता भी चुनावी है. नितांत अस्थाई. इसीलिए ऋत, सत्य और मर्यादा का चीरहरण है.

साभार: हृदयनारायण दीक्षित (http://goo.gl/U9Basu)

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