Pranayama

(1) प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर पूर्वाभिमुख, पालथी मार कर आसन पर बैठिए । दोनों हाथों को घुटनों पर रखिए। मेरुदण्ड, सीधा रखिए। नेत्र बन्द कर लीजिए। ध्यान कीजिए कि अखिल आकाश में तेज और शक्ति से ओत-प्रोत प्राण-तत्त्व व्याप्त हो रहा हैं। गरम भाप के, सूर्य प्रकाश में चमकते हुए, बादलों जैसी शकल के प्राण का उफन हमारे चारों ओर उमड़ता चला आ रहा है। और उस प्राण-उफन के बीच हम निश्चिन्त, शान्तचित्त एवं प्रसन्न मुद्रा में बैठे हुए हैं।

(2)नासिका के दोनों छिद्रों से धीरे-धीरे साँस खींचना आरंभ कीजिए और भावना कीजिए कि प्राणतत्त्व के उफनते हुए बादलों को हम अपनी साँस द्वारा भीतर खींच रहे हैं। जिस प्रकार पक्षी अपने घोंसले में, साँप अपने बिल में प्रवेश करता हैं उसी प्रकार वह अपने चारों ओर बिखरा हुआ प्राण-प्रवाह हमारी नासिका द्वारा साँस के साथ शरीर के भीतर प्रवेश करता हैं और मस्तिष्क छाती, हृदय, पेट, आँतों से लेकर समस्त अंगों में प्रवेश कर जाता हैं।

(3)जब साँस पूरी खिंच जाय तो उसे भीतर रोकिए और भावना कीजिए कि −जो प्राणतत्त्व खींचा गया हैं उसे हमारे भीतरी अंग प्रत्यंग सोख रहे हैं। जिस प्रकार मिट्टी पर पानी डाला जाय तो वह उसे सोख जाता है, उसी प्रकार अपने अंग सूखी मिट्टी के समान हैं और जल रूप इस खींचे हुए प्राण को सोख कर अपने अन्दर सदा के लिए धारण कर रहें हैं। साथ ही प्राणतत्त्व में संमिश्रित चैतन्य, तेज, बल, उत्साह, साहस, धैर्य, पराक्रम, सरीखे अनेक तत्त्व हमारे अंग-अंग में स्थिर हो रहे हैं।

(4) जितनी देर साँस आसानी से रोकी जा सके उतनी देर रोकने के बाद धीरे-धीरे साँस बाहर निकालिए। साथ ही भावना कीजिए कि प्राण वायु का सारतत्त्व हमारे अंग-प्रत्यंगों के द्वारा खींच लिए जाने के बाद अब वैसा ही निकम्पा वायु बाहर निकाला जा रहा है जैसा कि मक्खन निकाल लेने के बाद निस्सार दूध हटा दिया जाता है। शरीर और मन में जो विकार थे वे सब इस निकलती हुई साँस के साथ घुल गये हैं और काले धुँऐ के समान अनेक दोषों को लेकर वह बाहर निकल रहे हैं।

(5) पूरी साँस बाहर निकल जाने के बाद कुछ देर साँस रोकिए अर्थात् बिना साँस के रहिए और भावना कीजिए कि अन्दर के दोष बाहर निकाले गये थे उनको वापिस न लौटने देने की दृष्टि से दरवाजा बन्द कर दिया गया है और वे बहिष्कृत होकर हमसे बहुत दूर उड़ें जा रहे हैं। इस प्रकार पाँच अंगों में विभाजित इस प्राणाकर्षण प्राणायाम को नित्य ही जप से पूर्व करना चाहिए। आरंभ 5 प्राणायामों से किया जाय । अर्थात् उपरोक्त क्रिया पाँच बार दुहराई जाय। इसके बाद हर महीने एक प्राणायाम बढ़ाया जा सकता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे बढ़ाते हुए एक वर्ष में आधा घंटा तक पहुँचा देनी चाहिए। प्रातःकाल जप से पर्व तो यह प्राणाकर्षण प्राणायाम करना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त भी कोई सुविधा का शान्त, एकान्त अवसर मिलता हो तो उस में भी इसे किया जा सकता हैं।

 

Reference Books:

  1.  गायत्री महाविज्ञान – पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
  2. गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उनकी उपलब्धियां – पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

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