Pranayama

?24/02/2019_रविवारप्रज्ञाकुंज सासारामपंचकोशी साधना प्रशिक्षक बाबूजी “श्री लाल बिहारी सिंह” एवं आल ग्लोबल पार्टिसिपेंट्स।

? ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो नः प्रचोदयात् ?

? प्राण ?

? वीडियो अवश्य रेफर करें ?

? बाबूजी:-

? हमारा हर कार्य यज्ञमय हो। सृष्टि का हर एक कार्य यज्ञीय विज्ञान के अनुरूप कार्य करता है।
? पंचकोशी साधना ही उत्कृष्ट स्तर का त॔त्र विज्ञान है। अन्मयकोश – स्थुल शरीर, प्राणमयकोश + मनोमयकोश + विज्ञानमयकोश – सुक्ष्म शरीर एवं आनंदमयकोश – कारण शरीर।

पंचकोश गायत्री महाविज्ञान का प्रैक्टिकल है इसे कोई अलग से साधना ना समझा जाए। जप से मनोभूमि स्वच्छ होती है किंतु सर्वांगीण विकास के लिए पंचकोशी साधना मे प्रवेश करना होगा। पाँचो लेयर को पार करना होगा।

? प्राणायाम का मुख्य उद्देश्य अपने को उपर उठाना है और नीचे खींचने वाले चक्रवातों को प्रभावहीन करना है। प्राण की पहूंच पांचो कोश तक। संसारिक कार्य मे विवेकपूर्ण तरीके से प्राण को खर्च किया जाए बांकी एक बड़ा हिस्सा स्वयं को जानने (मैं क्या हूं?) में लगाया जाए। कम से कम आत्मसाक्षात्कार तो जायें। प्राण को प्राणायाम, मुद्रा एवं बंध से बढ़ाया जाये या समाज में रचनात्मक एवं साहसिक कार्यों द्वारा बढ़ाया जाए।

Pranayama

? ज्वाला है ईश्वर तो चिंगारी है आत्मा।
? स्वाध्याय का मतलब केवला पढ़ना नही बल्कि उसे पीना अर्थात् जीना। ब्राह्मण स्वयं को निचोड़कर दैवीय संपदा को धारण करते हैं। विवेक को बढ़ाना है। दूरदर्शी विवेकशीलता ऋतंभरा प्रज्ञा तक ले जाये।

यह सारा संसार वासना (रूप, रस, गंध, शब्द का खींचाव) से लबालब भरा हुआ है। जो इस ऋतंभरा प्रज्ञा रूपी नाव पर सवार होता है वही वासना के सागर से पार होता है।

? दूर्गति के विज्ञान को दूर करने को ही दुर्गा कहते हैं।
? सांसारिक थपेड़े को झेलने के बाद ही ब्रह्म ज्ञान की जिज्ञासा होती है।
? गायत्री महामंत्र इष्ट से जोड़ने का महामंत्र। जो भी इष्टदेव होंगे उनके गुणों का संवर्धन साधक के भीतर करने लगती है।

? मुद्रा के अभ्यास के साथ साथ उसमें मेडिटेशन जोड़ना आवश्यक। हस्त मुद्रायें एवं यौगिक मुद्रायें। जो देवताओं को प्रसन्न कर उनकी सिद्धियों को आत्मसात कराये वही मुद्रा है।

? श्रद्धा विज्ञान सबसे प्रभावी।

? सुबह 06:15 बजे बाबूजी के द्वारा दस मिनट का पावर योगा डेमो।?

? ॐ शांति शांति शांति?

संकलक – विष्णु आनन्द जी

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