चित्त की एक वृत्ति : निद्रा

The Supreme Truth Consciousness

Question – I have a question – we say that all the 5 senses are absorbed by mind when we are asleep and that’s the reason we do not feel hungry, thirsty or remember anything. Then how Nidra is considered to be one of the वृत्ति of our चित्त?

Answer:
When we are slept, do we have dream, or dreamless sleep? Either of two will occur.

When we awake, just after sleep, how do we feel, refreshed, tensed, still tired (mentally), having rajasik, tamasik or satbik feels after the sleep?

All these conditions are associated with the activities of Nidra, it is also a condition of our Chitta which affects our antahakrana and that is why it is termed as a Vritti of Chiita by Maharshi Patanjali in Samadhiapada of Yogasutra.

अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा । योगसूत्र समाधिपाद, १:१०।

जो वृत्ति अभाव के ज्ञान के अवलम्बन करने वाली है वह निद्रा वृत्ति कहलाती है।

जब निद्रा की स्थिति होती है, उस समय किसी बाह्य विषय का ज्ञान नही रहता। इसीलिए कहा जाता है कि सोने के समय हुई बातों का कोई ज्ञान नही है। इस ज्ञान के न होने का नाम ही निद्रा है। वस्तुतः निद्रा भी चित्त की ही वृत्ति विशेष है। महर्षि पतञ्जलि साधना में चित्त की हर अवस्था को वृत्ति मानते हैं। स्थिति भेद से निद्रा भी क्लिष्ट और अक्लिष्ट होती है।

निद्रा से जागने के बाद यदि मन मे सतोगुणी भाव जाग्रत हों, आलस्य दूर हो जाये तो अक्लिष्ट और विपरीत स्थिति रहे, योग साधना में विघ्न उत्पन्न हो तो क्लिष्ट।

निद्रा की भी साधना होती है अन्य वृत्तियों की तरह, ऋग्वेद के रात्रि सूक्त, योग तारावली में आचार्य शङ्कर इनकी चर्चा करते दिखते हैं।

इसे इस प्रकार भी समझ सकते है कि, निद्रा में भी 100% वृत्ति रहितता की स्थिति नही होती है, और वृत्तियाँ उसमे चलायमान रहती है, इसलिये महर्षि पतञ्जलि ने चित की हर एक स्थिति य्य हर वैसी स्थिति जो चित्त पर प्रभाव उत्पन्न करता हो उसकी वृत्ति की संज्ञा देते हैं।

एक उदाहरण लेते है, जैसे वृत्तियॉं क्या होती है, जो चित्त पर अपना प्रभाव डालती है और हमारे कर्मो को हमारी विचारणाओं को प्रभावित करती है और फिर क्रमशः इससे संस्कार बनते हैं जो पुनश्च चित में संग्रहित होते है और वे पुनः वृत्तियों को प्रभावित य्य उसके निर्माण में सहायता करती है। एक चक्रीय प्रक्रिया बनती है।

यह प्रभाव हम जाग्रत या सुषुप्ति किसी भी अवस्था में रहते है दोनों ही स्थिति में प्रभावित करती हैं हम।

जब जाग्रत रहते हैं तो हमारे जागते समय के विचारों और कर्मो पर प्रभाव डालती है, ये वृत्तियाँ क्लिष्ट और अक्लिष्ट में विभाजित की गई अपने प्रभाव के अनुसार, जिसके शमन लिए कई साधन बताए गए है ।

यही बात निद्रा की स्थिति में भी प्रयुक्त होती है और जब सोते हैं तो हमारा शरीर तो स्थूल क्रिया रहित होता है लेकिन सूक्ष्म क्रिया चलती रहती है, और वह वृत्तियॉं निद्रा की स्थिति में भी अपना प्रभाव डालती है, जैसे अच्छे बुरे स्वप्न आते रहे, स्वप्न में भी कुछ लुभावनी वस्तु दिख गयी जिसके बारे में कभी तो देखा था पर हाल फिलहाल में भूल गये और जागने के बाद वह याद रह तो मन मे उसकी प्राप्ति की इच्छा फिर से उठ गई। या इसके विपरीत कुछ डरावनी या हानिप्रद चीज देख लिए और जागने के बाद हमारे विचार उससे प्रभावित हो रहे।

यहां निद्रा में वृत्ति बनी रही, और निद्रा क्या है , इसकी परिभाषा सूत्र 10 में दे ही चुके हैं, कि यह ऐसी वृत्ति है जो बाह्य विषय के ज्ञान का ‘अभाव’ है। उन्होंने तो ‘अभाव’ के ज्ञान के अवलम्बन को भी वृत्ति कहा है यहां सामान्यतया तो बाह्य विषय केंज्ञान और प्रत्यय का कितना प्रभाव रहता है हमारी निद्रा में , सभी जानते हैं।

इसीलिए इसे भी दो भागों में विभक्त किया,

जागने के बाद आलस्य बना हुआ है, तामसिक राजसिक विचारणा आ रहे है, इत्यादि आए निद्रा सम्पूर्ण नही होती और शरीर में कोकलेश होता हो तो ऐसी निद्रा वृत्ति क्लिष्ट निद्रा वृत्ति कहते है, इसके विपरीत अक्लिष्ट, और हमे पहुचना कहाँ है, इन दोनो से परे


Question – अब कुछ समझ में आ रहा है। I was reading the book of swami niranjanananda saraswati. They described Nidra by further saying that many yogis who practice meditation and have control over their minds do not sleep. They rest, but they do not fall into deep sleep. Their sleep is called Shwana nidra. Their awareness remains very alert. When a restless Mind becomes quiet it enters into deep sleep, but a mind which is not agitated does not fall into a deep sleep. It attains a state of rest. So when you withdraw yourself, the agitations of the senses and the mind lessen. When you were active, the mind and the senses are agitated, but when you become internalized, when you are able to balance and restrain your mind, you become free from effects of mental agitation.

Is this state of nidra also considered to be vritti?

Answer:
Actually sleep of those yogis are not even called Nidra but a Yoga as Shri Krishna says in Bhagavadgita to Arjuna.

Shwana Nidra is also a Nidra, and would be termed as Vrittis from the reference point of Maharshi Patanjali, but the state which Swamiji mentioned is not a nidra (he would have termed it to make even easier to be easily understood by people who have not experienced it, and many of us have not experienced it with its core essence.) but YogaNidra or in higher state is Yoga as Shandilyopanishad or Various Puranas describe and when it is not disturbing the Chitta or creating any waves in our chitta consciousness, should not be termed as Vritti, as per definition of vritti.

One more thing all these terminologies are not absolute but have been described from some reference point to make us understand the concept.

वस्तुतः, महर्षि वेदव्यास के योगसूत्र पर भाष्य के अनुसार, महर्षि पतञ्जलि ने निद्रा को वृत्ति क्यो कहा, इस पर महर्षि व्यास कहते हैं, कि निद्रा के बाद निद्रा के समय के स्मृति के अनुसार हमारे चित्त पर उसका प्रभाव होता है इसलिए उसे वृत्ति कहते हैं।

मुझे अच्छी नींद आयी, मैने निद्रा के समय स्वप्न में हलवा खाया वह मीठा था, नींद के बाद मन प्रफुल्लित लग रहा है, मन अशांत है आदि आदि।

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।6.17।

दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।

स्वामी विवेकानंद जी निद्रा (स्वप्न+सुषुप्ति) दोनो को ही वृत्ति मानते हैं। कई दर्शनकार केवल सुषुप्ति को ही मानते हैं।

उनका कहना है कि जब हम सो के उठते है तब हम जान पाते है कि ” हम सो रहे थे ” और हमको स्मृति ‘अनुभव’ की ही हो सकती है। जिसका हमे अनुभव नही है उसकी हमे कभी भी स्मृति नही रहती।

अब मन की हर प्रतिक्रिया वह चित्त में उठा हुआ तरंग ही है । अगर निद्रा के समय चित्त में कोई भी तरंग उत्पन्न ना हो तो कोई भी अनुभव न होगा । और उसका हमे स्मरण नही रहना चाहिए । किन्तु निद्रा का हमे स्मरण रहता है उसका कारण यही है कि निद्रा के समय भी चित्त में कुछ प्रकार के तरंग रहते है । इसीलिए निद्रा को भी एक वृति कहा जाता है ।

निद्रा वृत्ति पर एक चर्चा ऊपर प्रस्तुत की गई है, इनपर योगदर्शन के अनुसार व अन्य योगसूत्रों पर विशद चर्चाओं को कुछ प्रमुख आचार्यो में योगसूत्र के भाष्य के साथ व उपनिषदों के तत्वदर्शन के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जाएगा।

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