02- वेद परिचय : ‘वेद’ अध्ययन का अनुशासन और अधिकार

Essence of Vedad

वेद विशिष्ट ज्ञान-विज्ञान के भाण्डागार हैं। किसी भी विशिष्ट विद्या को प्राप्त करने के लिए उसके विशिष्ट अनुशासनों का पालन करते हुए एक न्यूनतम स्तर तक व्यक्तित्व को ले जाना पड़ता है। उससे कम में हर कोई, किसी मनचाहे ढंग से उसका उपयोग करने अथवा लाभ पाने में समर्थ नहीं हो सकता।

बाँस की पोली नली से अग्नि को फूंक मारकर प्रज्वलित करने का ढंग थोड़े से संकेत से कोई भी सीख सकता है, किन्तु पोले बाँस को बाँसुरी के रूप में विकसित करने तथा उससे संगीत की मधुर ध्वनियाँ निकालने का कार्य संगीत का ज्ञाता ही कर सकता है। बाँसुरी सुरीली बने, इसके लिए छेदों के आकार तथा उनकी परस्पर दूरियों का निर्धारण कितनी सावधानी से करना पड़ता है और उसका कितना महत्त्व है । यह बात कोई कनसुरा (जिसके कान स्वरों का अंतर ही नहीं समझते-ऐसा) व्यक्ति नहीं समझ सकता। इसी प्रकार कद्दू के खोल, प्लाई और तार के संयोग से सितार की और उसके जादू भरे संगीत की बात कोई ऐसा व्यक्ति कैसे समझ सकता है, जो संगीत विद्या से सर्वथा दूर ही रहा हो?

वेद मंत्रों में पराचेतना के गूढ़ अनुशासनों का समावेश है। शब्दार्थ और व्याकरण आदि तो उसके कलेवर मात्र हैं। वे मंत्रों के भाव समझने में सहायक तो होते हैं, किन्तु केवल उन्हीं के सहारे गूढ़ तत्त्वों को समझा जाना संभव नहीं। स्वयं वेद में इस तथ्य को प्रकट किया गया है। जैसे – ऋग्वेद १.१६४.३९ में कहा गया है – “ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन देवा अघि विश्वे निषेदुः” अर्थात् ऋचाएँ परम व्योम में रहती है, जिसका देवत्व अपरिवर्तनीय है। आगे कहा गया है – “यस्तन्न वेद किमचा करिष्यति” जो उस अपरिवर्तनीय सत्य को नहीं समझता, उसके लिए मात्र ऋचा क्या करेगी? यह कथन उसी तरह सत्य है, जिस प्रकार यह कथन कि ‘जो संगीत का ज्ञाता नहीं, उसके लिए मात्र बाँसुरी क्या करेगी ?’ इसी प्रकार भाषा की सीमा बतलाते हुए ऋ०१०.७१.१ में कहा गया है – बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं यत् प्रैरत नामधेयं दधानाः । यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत् प्रेणा तदेषां निहितं गुहाविः ॥ हे बृहस्पते ! सर्वप्रथम पदार्थों के नाम आदि का भाषा ज्ञान प्राप्त होता है। यह वाणी का प्रथम सोपान है। ज्ञान का जो दोष रहित-श्रेष्ठ शुद्ध स्वरूप है, वह गुफा में छिपा है,जो दिव्य प्रेरणा से प्रकट होता है।

भाषा ज्ञान वाणी का प्रथम सोपान है। उससे प्रेरित होकर पदार्थों को देखा-पहचाना जा सकता है, किन्तु विचारों और भावनाओं की गहराई (गुफा) तक पहुँचने के लिए तो विशेष अन्त:स्फुरणा आवश्यक होती है। यदि किसी प्रभावशाली राग की सरगम (स्वरलिपि) लिख दी जाये, तो उससे राग को समझने में सहायता तो मिलेगी, किन्तु संगीत-निपुण व्यक्ति के निर्देशन में साधना करके ही उसे पाया जा सकता है।

वेदवाणी के संदर्भ में भी ऋषियों का यही मत है। ज्ञानी लोग श्रेष्ठ वाणी को यज्ञ से ही प्राप्त करते है। उन्होंने तत्वज्ञानी ऋषियों के अन्त:करण में प्रविष्ट वाणी को प्राप्त करके उस ज्ञान को सम्पर्ण विश्व में प्रसारित किया। इसी वाणी (दिव्य ज्ञान) को सात छन्दों में स्तुति रूप में प्रस्तुत किया । वेद वाणी को यज्ञ के माध्यम से पाया गया– यह वाक्य गूढार्थक है।

यज्ञ-यजन का अर्थ है- देवपूजन, संगतिकरण, दान। विद्या के विशेषज्ञ-दाता, देवता का पूजनश्रद्धा युक्त अनुगमन पहली शर्त है। उसके निर्देशानुसार स्वयं साधना – अभ्यास रूप में संगतिकरण करके ही व्यक्ति विद्याविद बनता है। इससे कम में किसी विशेषज्ञ के अन्त:करण में संचित अनुभवजन्य विद्या को प्राप्त करना संभव नहीं है। इतना करके ही कोई व्यक्ति दान रूप में विद्या का विस्तार करके उसे सार्थक बना सकता है।

यहाँ एक बात और भी ध्यान देने योग्य है- वेद वाणी जड़ नहीं है। वह चेतन का प्रतिनिधित्व करती है और स्वयं भी चेतन है। चेतन में स्वयं भी चयन करने की क्षमता होती है। वह सत्पात्रों को पहचान कर स्वयं अपना प्रभाव उसके सामने खोल देती है। कुछ लोग उस वाणी को सुनने के पश्चात् (अर्थ न समझ पाने के कारण) न सूने के समान ही रह जाते हैं। कुछ धारणा शक्ति के अभाव मे मन से देखने पर भी न देख पाने (अद्रष्टा) जैसे रह जाते है। वह वाणी किसी अधिकारी के पास ही अपने स्वरूप को वैसे ही स्पष्ट करती है, जैसे सन्दर वस्त्रों में लिपटी पत्नी अपने पति के पास ही अपना वास्तविक रूप प्रकट करती है। जो लोग तप द्वारा श्रद्धा एवं मानस के परिष्कार के बिना वेदज्ञान का अनुभव करना चाहते हैं, वे शब्द जंजाल की माया में ही भटककर रह जाते हैं। कोई-कोई स्थिर मति वाला ही वेद वाणी को ठीक से समझ पाता है। अन्य तो पुष्प एवं फल रहित शब्दों की माया में ही भटकते रह जाते हैं।

यही कारण है कि बड़ी संख्या में शौकिया वेद अध्येता मंत्रों के तत्व तक नहीं पहुँच पाते । श्री अरविन्द ने वेद रहस्य में यह बात स्पष्ट करते हुए लिखा है कि उपनिषद काल (जब साधकों के अन्त:

करण पर्याप्त शुद्ध थे) में भी उन्हें तत्त्वज्ञान प्राप्त करने के लिये तप करने और दीक्षित होने के लिए कहा जाता था। अब, जब जीवन लगभग पूरी तरह पदार्थोन्मुख हो गया है, तब पराचेतन के सूत्र स्वरूप वेदवाणी की गहराई कैसे समझ में आये? इसका अर्थ यह नहीं कि वेदों में दिये गये सारे मंत्र सामान्य बुद्धि से परे हैं। कहीं-कहीं ऋषिगण व्यावहारिक अध्यात्म के जीवन निर्माण के, मार्मिक सूत्र प्रकट करते हुए कहते हैं – ‘जिह्वाया अग्रे ……भूयास मधुसंदृशः” (अथर्व० १. ३४) अर्थात् “मेरी जिह्वा के अग्र भाग में मधु हो,जिह्वा का मूल मधुर हो, मेरा आचरण और व्यवहार मधुर हो। मैं वाणी से मीठा बोलू और मधुर बन जाऊँ।” इसी प्रकार ऋषिगण लोकशिक्षण का महत्व समझाते हुए कहते हैं – ‘यदन्तरं तद् बाह्यं यद् बाह्यं तदन्तरम्’ (अथर्व०२.३०.६) अर्थात् “जो तुम बाहर से हो, वही अन्दर से भी बन जाओ, जो अंदर हो, वही बहिरंग में प्रकट हो”। इस प्रकार व्यक्तित्व को कैसे सुव्यवस्थित रखा जाय, यह एक महत्त्वपूर्ण सूत्र भी वे दे देते हैं। इस प्रकार सर्वसुलभ मंत्रों का भाव समझने में भी यदि मधु का अर्थ मात्र शहद लिया जाये, तो जिह्वा के अग्र भाग पर मधु का अर्थ शहद चाटने के संदर्भ में चला जायेगा और आगे का क्रम बकवास जैसा लगेगा। मधु का अर्थ मधुरता ही लेने से बात बनेगी। कथन की काव्यात्मकता को ध्यान में रखकर ही चलना होगा।

उक्त संदर्भो से यह स्पष्ट होता है कि पाश्चात्य विद्वान् वेदार्थ के अनुशीलन में एक सीमा तक ही सफल हो सके। उन्होंने एक ओर जहाँ वेद को प्रकाशित करके उस ओर विज्ञ समाज का ध्यान खींचने का स्तुत्य प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर वे उसके गूढ तत्त्व तक न पहुँच सकने के कारण स्वयं तो भटके ही, अन्य भोले-भाले जिज्ञासुओं के मन में भ्रामक धारणा पैदा कर दी। अपनी बौद्धिक क्षमता के नशे में गूढ़ अर्थों में सायण जैसे आचार्यों की निन्दा करने में भी वे नहीं चूके। जबकि वैदिक साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान आचार्य बलदेव उपाध्याय लिखते हैं कि “हमारा तो यह निश्चित मत है कि वैदिक सम्प्रदाय के सच्चे ज्ञाता होने के कारण सायण का वेदभाष्य वास्तव में वेदार्थ की कुंजी है और वेद के दुर्गम दुर्ग में प्रवेश कराने के लिए यह विशाल सिंह द्वार है” -(वैदिक साहित्य और संस्कृति पृ० ५३)।

इसी कारण कई भारतीय विद्वान् उन पाश्चात्य विद्वानों पर यह आक्षेप लगाने लगे कि वे वेद के प्रति छद्मरूप से अश्रद्धा उत्पन्न करना चाहते हैं। पाश्चात्य विद्वानों की नीयत क्या थी ? इस झमेले में न पड़े, तो भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि वेदाध्ययन के लिए ऋषियों की दृष्टि का ही अनुगमन करना आवश्यक है।

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

संदर्भ ग्रन्थ : अथर्ववेद-संहिता परिचय वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा

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