03- वेद परिचय : वेद – अध्ययन की मूल अवधारणा

वेद अध्ययन के संदर्भ में कहा जाता है कि ऋषि, देवता एवं छन्द को जाने बिना मंत्रार्थ खुलते नहीं है। महर्षि कात्यायन प्रणीत सर्वानुक्रमणी (१, १) तथा महर्षि शौनक कृत बृहद्देवता (८.१३२) में स्पष्ट लिखा है कि ऋषि, देवता एवं छन्द समझे बिना वेदार्थ का प्रयास करने वाले का श्रम निरर्थक जाता है अथवा पापमूलक हो जाता है।

यहाँ ऋषि का अभिप्राय है -कहने वाले (यस्य वाक्यं स ऋषि:) का व्यक्तित्व । देवता का भाव है – प्रकृति की किस शक्तिधारा को लक्ष्य करके बात कही गयी है (या तेनोच्यते सा देवता) । छन्द का अर्थ है कि इसमें काव्यात्मकता किस शैली की है ( यद् अक्षरपरिमाणं तच्छन्दः – ऋ० सर्वा० २.६) ।

ऋषि – यह अभिव्यक्ति किसकी है, यह बात बहुत महत्त्व रखती है। ‘मत्सम: पातकी नास्ति’ (मेरे जैसा पापी कोई नहीं) यह वाक्य किसी अपराधी या कुण्ठित व्यक्ति का है तो बात और है; किन्तु जब जगद्गुरु आचार्य शंकर यह वाक्य बोलते हैं, तो अध्येता एकदम चौंकता है । आचार्य के स्तर को वह जानता है, इसलिए वाक्य का अर्थ हीन प्रसंग में नहीं, उच्च आध्यात्मिक संदर्भ में निकालता है । यदि वक्ता का स्तर पता न हो, तो गूढ़ उक्तियों के बारे में मतिभ्रम स्वाभाविक है। वेद गड़रियों के गीत हैं या तत्त्वदर्शियों के कथन ? इस अवधारणा से हमारी अन्त: -चेतना की जागरूकता में जमीन-आसमान जितना अंतर पड़ जाता है।

देवता – प्रत्येक गढ़ क्रिया के मूल में स्थित दिव्य शक्ति प्रवाह की समझे बिना सूत्र कैसे समझ में आ सकते हैं । किसी देवता से यह प्रार्थना करें कि ‘हे देव! सैकड़ों योजन दूर उत्पन्न ताप को लाकर हमारा आवास गर्म कर दें।’ तो यह बात पागल का प्रलाप जैसी लगेगी; किन्तु विद्युत् के शक्ति प्रवाह को ‘देवता’ कहकर यह प्रार्थना की जाए तो एक सर्वमान्य सत्य प्रकट होता है। दूरस्थ ताप विद्युत् गृह में जल रहे कोयले की गर्मी से हमारे घर गर्म होते ही हैं। अस्तु ऋषि जिस देवता (शक्तिधारा) को लक्ष्य कर रहे हैं, उसका आभास हुए बिना उक्ति निरर्थक लगती है। किसी ने सूर्य या अग्नि से भयभीत होकर प्रार्थना की है अथवा उस दिव्य कल्याणकारी देवशक्ति का साक्षात्कार करके सूत्र दिये हैं ? इस मान्यता से चिन्तन का आधार ही बदल जाता है।

छन्द -काव्य के छन्द विशेष में किसी भाव विशेष को व्यक्त करने की सामर्थ्य होती है। वीर रस के छन्द से करुण रस के भाव नहीं जगते । छन्द की सामर्थ्य शब्दों से भिन्न है। वे भावों को स्पष्ट करने में कहीं-कहीं शब्दों से अधिक प्रभावी सिद्ध होते देखे जाते हैं । अस्तु भावों की गहराई तक पहुँचने में छन्द भी सहायक होते हैं । ‘चीटी पाँवे हाथी बाँध्यो’ उक्ति सामान्य रूप से एक उपहास जैसी लगती है; किन्तु यह कबीर की उलटबासी है, यह सोचते ही बद्धि के कपाट स्वत: खुल जाते हैं।

अधिकार – अधिकार सम्बन्धी बात भी अनुशासनपरक ही है। किसी अनभवी से उसके अनुभव प्राप्त करने के लिए उसके अनुशासन में दीक्षित (संकल्प पूर्वक प्रवृत्त) होना पड़ता है। ब्राह्मी चेतना के अनुशासन को समझकर तदनुसार जीवन जीने के संकल्प के साथ समर्थ गुरु का वरण करने पर साधक को ‘द्विज’ संज्ञा दी जाती थी। ‘द्विज’ का अर्थ होता है-दुबारा जन्म लेने वाला। माँ के गर्भ से शरीर के जन्म के साथ शारीरिक शक्तिधाराओं का विकास होने लगता है। जब साधक अन्त:करण का शाक्तधाराओं के विकास के लिए समर्थ गुरु से जुड़ता है, तब वह उसका दूसरा जन्म कहलाता है। वेद ब्रह्मविद्या के संवाहक हैं। उन्हें समझने के लिए ब्रह्मनिष्ठ जीवन का संकल्प आवश्यक है।

उक्त संदर्भ में द्विजों को ही वेद अध्ययन फलेगा, यह बात विवेकसंगत एवं सार्थक है। जन्म-जाति विशेष से उसे जोड़ने से ही भ्रम फैले हैं। वे प्रसंग सर्वविदित है कि ‘जाबाला’ के पुत्र सत्यकाम तथा इतरा के पुत्र ऐतरेय को ब्रह्मविद्या में प्रवेश भी मिला और वे ऋषि स्तर तक पहुँचने में सफल भी हुए। इसलिये किसी को जन्म-जाति गत भ्रमों में न उलझ कर पात्रता के विकास द्वारा वेदाधिकार प्राप्त करने का करना चाहिए।

वेद ज्ञान को ऋषियों ने नेति-नेति कहकर श्रद्धा व्यक्त की है। उसे पूरा न समझ पाने से नही निराश होना चाहिए और न उसे निरर्थक कहकर तिरस्कृत करना चाहिए । निरुक्तकार यास्क ने भी वेद के लगभग ४०० ऐसे शब्द गिनाये, जिनका अर्थ उन्हें नहीं पता था। जब शब्दार्थ का यह हाल है तो भावार्थ तो और भी गूढ़ होते हैं। वे तो साधना के अनुपात से ही खुलते हैं । अस्तु, विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि ऋषियों के निर्धारित अनुशासन के अनुसार वेद का अध्ययन करने वालों को वेद भगवान के अनुग्रह से जीवनोपयोगी सूत्र प्राप्त होते रहे । और सदैव प्राप्त होते रहेंगे।

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

संदर्भ ग्रन्थ : अथर्ववेद-संहिता परिचय वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा

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