04- वेद परिचय : वेद में प्रतीक एवं रूपक

वेद में जिन पात्रों का उल्लेख होता है, वे रूपक के रूप में प्रयुक्त हैं। उन्हें शरीरधारियों से जोड़ने के प्रयास में हर जगह सफलता नहीं मिलती। ऐसा मानने से वेद की स्वाभाविक गरिमा की रक्षा भी नहीं हो पाती। अस्तु, वे वेद के पात्र भले ही लौकिक संदर्भ में भी सिद्ध हो जाते हैं; किन्तु उन्हें वहीं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उनका प्रयोग रूपक के रूप में करने से ही बात बनती है। जैसे- ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में कहा गया है- सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे। जुहूमसि द्यविद्यवि (ऋ० १.४.१) । (गोदोहन करने वाले के द्वारा) प्रतिदिन मधुर दूध प्रदान करने वाली गाय को जिस प्रकार बुलाया जाता है, उसी प्रकार हम अपने संरक्षण के लिए सौंदर्यपूर्ण यज्ञकर्म सम्पन्न करने वाले इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं। इसी प्रकार इन्द्र के संदर्भ में कहा गया है कि वे सभी रूपों को बनाने वाले हैं और दुहने वाले के लिए भरपूर दूध देने वाली गौ के समान हैं- इन्द्र को गौ की तरह दुहा जा सकता है, तो वे इन्द्र कोई पुरुष तो नहीं ही हो सकते, किसी शक्तिधारा के रूप में ही उन्हें समझा-जाना जा सकता है। इससे भी बढ़कर कहा जाता है:- वही गौ है, वही अश्व है- इन्द्रो वा अश्वः (कौषी० बा० १५.४); (इन्द्र अश्व रूप हैं।) इन वाक्यों का सही अर्थ निकालने के लिए गौओं-अश्वों और इन्द्र को शक्ति-प्रवाहों के रूप में ही स्वीकार करना पड़ेगा।

अस्तु, वेदों के प्रतीकवाद को दृष्टिगत रखकर ही वेदमंत्रों का ठीक-ठीक अर्थ किया जा सकता है। बाह्मण ग्रन्थों में भी इस दृष्टिकोण का समर्थन किया गया है। उन्होंने ऋषियों एवं देवताओं को ‘प्राण की धाराएँ’ अर्थात् चेतनायुक्त शक्ति माना है। के तऽऋषय इति प्राणा वाऽ ऋषयस्ते। “वे ऋषि कौन थे? प्राण ही वे ऋषि थे” (शत० ब्रा० ६.१.१.१), प्राणो वै वसिष्ठ ऋषिर्यद्वै नु श्रेष्ठस्तेन वसिष्ठो। ” प्राण ही वसिष्ठ ऋषि हैं। श्रेष्ठ होने से वसिष्ठ कहा गया है” (शत० ब्रा०८.१.१.६), प्राणा वै देवा: “प्राण ही देव हैं” ( शत० ब्रा० ६.७.२.३), कतम एको देव इति प्राण इति – एक देव कौन है ? ‘प्राण'( शत० बा०११.६.३.१०)।

श्री अरविन्द ने वेदरहस्य में विभिन्न उदाहरण देकर यह सिद्ध किया है कि वेद के पात्र गुह्य रूपकों के रूप में ही समझे जा सकते हैं । वेद के मूल उद्देश्य के बारे में उनका कथन है कि वेद का केन्द्रभूत विचार है- “अज्ञान के अन्धकार में से सत्य की विजय करना और सत्य की विजय के साथ ही अमरता की भी विजय कर लेना; क्योंकि वैदिक ‘ऋतम् ‘ जहाँ मनोवैज्ञानिक विचार है, वहाँ आध्यात्मिक विचार भी है। यह ‘ऋतम्’ परमात्म सत्ता का सत्, सत्य चेतन और सत्य आनन्द है, जो इस शरीररूपी पृथ्वी इस प्राण शक्तिरूप अन्तरिक्ष एवं मनरूप सामान्य आकाश या द्यौ से परे है। हमें इन सब स्तरों को पार कर आगे जाना है ताकि हम उस पराचेतन सत्य के उच्चस्तर में पहुँच सकें, जो देवों का स्वकीय घर है और अमरता का मूल है।”

श्री अरविन्द का मत है कि इस यात्रा में सहायक शक्तियाँ देवता एवं ऋषिगण हैं तथा उक्त यात्रा में बाधक-अवरोधक शक्ति धाराएँ दस्यु-दानव आदि है। विभिन्न पात्रों-रूपकों के सन्दर्भ में उनके निष्कर्ष कुछ इस प्रकार हैं– अंगिरस् और वृत्र ऐसे रूपक है, जो वेद में बार-बार आते हैं- इमे भोजा अङ्गिरसो विरूपा (ऋ०१.५३.७), वृत्रस्य यद् बद्धानस्य रोदसी (ऋ० १.५२.१०) । उन्होंने अग्नि को दिव्यज्ञान से उद्दीप्त वह ज्वाला कहा है, जो सत्य एवं अमरत्व की यात्रा अथवा संघर्ष में विजय के लिए प्रज्वलित की जाती है- कविर्देवानां परिभूषसि व्रतम् (ऋ० १.३१.२), स्वग्नयो हि वार्य देवासो (ऋ०१.२६.८), रुक्मी त्वेष: समत्सु (ऋ० १.६६.६)। अंगिरस् उस ज्वाला को प्रज्वलित करने वाली द्रष्टा संकल्प की शक्तियाँ हैं।

वृत्र, पणि, दस्यु आदि उक्त यात्रा में बाधा पहुँचाने वाली हीन शक्तियों को कहा गया है, जैसे – इन्द्रो यद् वृत्रमवधीन्नदीवृतं (ऋ०१.५२.२), निरुद्धा आप: पणिनेव गावः (ऋ०१.३२.११)I बृहस्पति सर्जनकारी शब्द के अधिपति हैं- मन्द्रजिह्व बृहस्पतिं वर्धया (ऋ० १.५९०.१) । सरस्वती को दिव्य शब्द की धारा या सत्य की अन्त:प्रेरणा कह सकते हैं- महो अर्ण: सरस्वती पचेतयति केतुना । धियो विश्वा वि राजति (ऋ० १.३.१२) । उषा दिव्य अरुणोदय है, वह दिव्य स्फुरणा है, जिसके पीछे पराचेतन सत्य का सूर्य उदित होता है- व्यञ्जते दिवो अन्तेष्वक्तन् विशो न युक्ता उषसो यतन्ते। सं ते गावस्तम आ वर्तयन्ति ज्योतिर्यच्छन्ति सवितेव बाहू (ऋ० ७.७९.२) अर्थात् उषा देवियाँ अपने तेज को अन्तरिक्ष में फैलाती हैं एवं प्रजाओं की तरह परस्पर मिलकर अन्धकार विनष्ट करने की चेष्टा करती हैं और सूर्यदेव की भुजा रूपी किरणों की ज्योति द्वारा अन्धकार का विनाश करती हैं।

इससे स्पष्ट होता है कि गौ दिव्य ज्ञान की वे रश्मियाँ हैं, जो सत्य का बोध कराती हैंअश्व उस सनातन सत्य की संचरण क्षमता है। घृत गौओं- दिव्य किरणों से उत्पन्न वह तेजस् है, जो आत्मशक्ति को -देव शक्तियों को पुष्ट बनाता है। उस पराचेतन सत्य का प्रवाह अखण्डित रहता है, तो देवशक्तियों का उद्भव और विकास होता है; इसलिए अदिति (जो खण्डित नहीं) देवों की माता है। इसके विपरीत इस दिव्य प्रवाह के खण्डित होने से अज्ञान-भ्रम आदि दोषों की उत्पत्ति होती है। अस्तु, दिति (खण्डित होने वाली) दैत्यों की माता है।

अश्व (शक्ति-प्रवाहो) तथा गौ (प्रकाश देने वाली पोषक धाराओं) का अपहरण दानव कर लेते हैं, तब आर्यों (दिव्य अनुशासन का अनुगमन करने वालो) के हित में इन्द्र, मरुत्, मित्र, वरुण आदि देव शक्तियाँ युद्ध करती हैं। वे दानवो (अनृत-अज्ञान-पाप की शक्तियों) के दुर्ग को तोड़कर गौओं और अश्वों को मुक्त कराते हैं।

अश्विनीकुमारों को जुड़वाँ (यमल) माना गया है। उन्हें देववैद्य की संज्ञा भी प्राप्त है। अश्विनी का अर्थ होता है- अश्वों (किरणों) से युक्त । उन्हें आनन्द, आरोग्य एवं पुष्टिदायक कहा गया है। आरोग्य एवं पुष्टि देने वाले दो प्रवाह प्रकृति में एक साथ उपलब्ध हैं-

१.पदार्थों, जल, अन्न, वनस्पतियों आदि में आरोग्य एवं पुष्टि भरने वाले अन्तरिक्षीय प्रवाह तथा
२. पदार्थों से उभरने वाले आरोग्य एवं पुष्टिदायक प्रवाह।

ये दोनों प्रवाह एक साथ रहने वाले अभिन्न होते हुए भी अपनी अलग-अलग विशिष्टताएँ भी रखते हैं- प्रवां निचेरुः ककुहो वशाँ अनु पिशङ्गरूप: सदनानि गम्या: । हरी अन्यस्य पीपयन्त वाजैर्मध्ना रजांस्यश्विना वि घोषैः (ऋ ० १.१८१.५) ‘हे अश्विनीकुमारो! आप दोनों में से एक का पीतवर्ण युक्त (सूर्य के समान स्वर्णिम) तथा सर्वत्र गमनशील रथ, इच्छित दिशाओं एवं आवासों में पहुँचता है। दूसरे का,मन्थन से उत्पन्न घोड़े (अग्नि) अन्नों एवं उद्घोषों (मन्त्रों ) सहित सम्पूर्ण लोकों को पुष्टि प्रदान करते हैं।’ वेद मन्त्रों के अर्थ ऐसे प्रतीकात्मक अनुभूतिजन्य रूपकों के आधार पर ही समझे जा सकते हैं।

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

संदर्भ ग्रन्थ : अथर्ववेद-संहिता परिचय वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा

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