05- वेद परिचय : वेद एवं यज्ञ

वेद एवं यज्ञ का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। यज्ञ का कर्मकाण्ड पक्ष ही लें, तो भी देव पूजन के क्रम में ऋग्वेद के मन्त्रों से स्तुतियाँ करने, यजुर्वेद के मंत्रों से यजन प्रयोग करने, सामगान द्वारा यज्ञीय उल्लास को संवर्धित और प्रसारित करने तथा अथर्ववेद से स्थूल-सूक्ष्म परिष्कार की वैज्ञानिक प्रक्रिया चलाने की मान्यता सर्वविदित है। यदि यज्ञ का विराट रूप लें, तो पुरुष सूक्त के अनुसार उस विराट् यज्ञ द्वारा ही सृष्टि का निर्माण हुआ तथा उसी से उसके पोषण का चक्र चल रहा है। उसी विराट् यज्ञीय प्रक्रिया के अंतर्गत सृष्टि के संचालन एवं पोषण के लिए उत्कृष्ट ज्ञान-वेद का प्रकटीकरण हुआ। यथा- ततो विराळजायत विराजो अधिपूरुषः। सजातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः (ऋ० १०.९०.५) अर्थात्-‘ उस विराट् पुरुष से यह ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ। उसी से समस्त जीव प्रकट हुए। देह-धारियों के रूप में वही श्रेष्ठ पुरुष स्थित है। उसने पहले पृथ्वी और फिर प्राणियों को उत्पन्न किया। ‘तस्मात् यज्ञात् सर्वहुत ऽऋचः सामानि जज्ञिरे। छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तमादजायत (ऋ० १०.९०.९) उस विराट् यज्ञ पुरुष से ऋग् एवं साम का प्रकटीकरण हुआ। उसी से छन्दों की और यजु एवं अथर्व की उत्पत्ति हुई।

वेद यज्ञीय प्रक्रिया से प्रकट हुए हैं और यज्ञीय अनुशासन में जीवन को गतिशील बनाने के लिए हैं। वेद मंत्र परा-चेतन और प्रकृतिगत गूढ़ अनुशासनों-रहस्यों का बोध कराते हैं। उन्हें समझकर ही प्रकृतिगत चेतन प्रवाहों तथा स्थूल- पदार्थों का प्रगतिशील एवं कल्याणकारी प्रयोग किया जाना सम्भव है, जैसे अग्नि या विद्युत् के स्वाभाविक गुण-धर्मों को समझे बिना व्यक्ति उनका उपयोग भली प्रकार नहीं कर सकता। अग्नि को धारण करने के लिए अज्वलनशील (नॉनइन्फ्लेमेबिल) पदार्थ ही चाहिए तथा उसे प्रज्वलित रखने के लिए ज्वलनशील (इन्फ्लेमेबिल) पदार्थों की ही संगति बिठानी पड़ेगी। विद्युत् को इच्छित उपकरणों तक ले जाने के लिए विद्युत् सुचालक (इलैक्ट्रिकल कंडक्टर्स) तथा फैलकर नष्ट हो जाने से बचाने के लिए विद्युत् कुचालक (इलैक्ट्रिकल इन्सुलेटर्स) का व्यवस्थित क्रम बिठाना अनिवार्य है। जो व्यक्ति विद्युत् एवं पदार्थों का गुणधर्म ही नहीं समझता, वह कैसे विद्युत् तंत्र (इलैक्ट्रिकल नैटवर्क) स्थापित कर सकता है?

अस्तु, वेद ने प्रकृति के गूढ़ तत्त्वों को प्रकट करते हुए कहा है कि ये प्रवाह एवं पदार्थ यज्ञार्थ हैं, इन्हें यज्ञीय अनुशासनों में प्रयुक्त करने से सत्पुरुष, देवों के समान ही स्वर्गीय परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकते हैं। इसी यज्ञीय आचरण प्रणाली को उन्होंने यज्ञ कहा- यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्या: सन्ति देवाः। (३०१०.९०.१६) “ देवों ने यज्ञ (प्रक्रिया) से या (विराट् पुरुष जिनका धर्मकृत्यों में प्रथम स्थान है) का यजन किया। (जो सत्पुरुष) इस पूर्व प्रयुक्त प्रक्रिया का अनुसरण करते हैं, वे देवों के आवास स्वर्ग के अधिकारी बनते हैं।” उक्त संदर्भोँ से स्पष्ट होता है कि वेदोक्त ‘यज्ञ’ मात्र अग्निहोत्र परक कर्मकाण्ड ही नहीं है, वह स्रष्टा के अनुशासन में भावना, विचारणा, पदार्थ एवं क्रिया के संयोग से उत्पन्न होने वाला एक अद्भुत पुरुषार्थ है। वेद में इसके अनेक रूप परिलक्षित होते हैं–

पहला यज्ञ, पराचेतन (विराट् पुरुष या ब्रह्म) के संकल्प से सृष्टि के उद्भव के रूप में दिखाई देता है।

दूसरा स्वरूप यज्ञ का वह है, जिसके अन्तर्गत उत्पन्न स्थूल एवं सूक्ष्म तत्त्व, अनुशासन विशेष का अनुपालन करते हुए सृष्टि चक्र को सतत प्रवहमान बनाये हुए हैं।

यज्ञ का तीसरा स्वरूप यह है कि जिस क्रम में प्राणि जगत् प्रकृति के प्रवाहों को आत्मसात् करते हुए उत्पन्न ऊर्जा से स्वधर्मरत रहता है और प्रकृतिगत यज्ञीय प्रवाहों को अस्त-व्यस्त नहीं होने देता।

मनुष्यों द्वारा किये जाने वाले कर्मकाण्ड युक्त देवयज्ञ उस वैज्ञानिक प्रक्रिया के अंग है, जिसके अन्तर्गत मनुष्य प्रकृति के पोषक प्रवाहों को पुष्टि प्रदान करने का प्रयास करता है। यह यज्ञ का चौथा स्वरूप है।

अब प्रश्न उठता है कि इस यज्ञीय कर्मकाण्ड के लिए ऋषियों ने मनुष्यों को क्यों प्रेरित किया? जब कि अन्य प्राणियों से यह अपेक्षा नहीं की जाती। सभी प्राणी प्रकृतिमत प्रवाहों का स्वाभाविक उपयोग करते हुए अपना निर्वाह भर करते रहते हैं। उनमें से कोई भी ‘प्रकृति का दोहन’ नहीं करता। मनुष्य में प्रकृति का दोहन करने की क्षमता है। उसका दायित्व बनता है कि यदि प्रकृति का दोहन करता है, तो उसके पोषण के भी विशेष प्रयास करे। हर मादा अपने बच्चों के पोषण के लिए दूध उत्पन्न करती है। यदि मनुष्य ‘गाय’ का दोहन अपने लिए करता है, तो उसका दायित्व बनता है कि गाय के पोषण की ऐसी व्यवस्था भी बनाये, जिससे दोहन के बाद भी उसके बच्चे के लिए पर्याप्त दूध पैदा होता रहे।

आज मनुष्य प्रकृति का केवल दोहन ही करना चाहता है, उसके पोषण के दायित्व और उसकी उपयुक्त प्रक्रिया दोनों को वह भुला चुका है। यही कारण है कि मनुष्य को प्रकृतिगत असंतुलन (इकॉलाजिकल अनबैलेन्सिंग) के कारण उत्पन्न प्रदूषण से लेकर अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प जैसे प्राकृतिक विप्लवों को दण्ड के रूप में झेलना पड़ रहा है। वेद द्वारा निर्दिष्ट यज्ञीय जीवन शैली अपनाकर मनुष्य परम पिता के प्रतिनिधि के रूप में अपनी स्थूल एवं सूक्ष्म सामर्थ्यो के यज्ञीय सुनियोजन से भूमण्डल पर स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है।

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

संदर्भ ग्रन्थ : अथर्ववेद-संहिता परिचय वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा

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