07- वेद परिचय : वैदिक स्वर

वैदिक ऋचाओं में अक्षरों के ऊपर और नीचे विभिन्न प्रकार की खड़ी और आड़ी रेखाएँ देकर उनके नियमानुसार अक्षरों के उच्च, मध्यम एवं मन्द स्वर में उच्चारित करने के नियम विद्वान् ऋषियों ने बनाये हैं। इन्हें स्वर कहा जाता है। इनको तीन भागों में बाँटा गया है-१. उदात्त २. अनुदात्त और ३. स्वरित; किन्तु इनमें से भी प्रत्येक स्वर अधिक या न्यून रूप में बोला जा सकता है । इसीलिए हर एक के दो-दो भेद हो जाते हैं, जैसे- उदात्त-उदात्ततर, अनुदात्त-अनुदात्ततर, स्वरित-स्वरितोदात्त । इन स्वरों के अलावा एक स्वर और माना गया है- ‘एक श्रुति,’ इसमें तीनों स्वरों का मिलन हो जाता है। इस तरह से इनकी संख्या सात मानी गई है । इन स्वरों की व्याख्या भाष्यकार पतंजलि ऋषि ने *’ स्वयं राजन्त इति स्वराः’* इत्यादि शब्दों में विस्तार से की है। इन सात भेदों में भी एक-दूसरे का आपस में मिलन होने से कई तरह के भेद हो जाते हैं, जिनके लिए स्वर चिह्नों में कुछ परिवर्तन किया जाता है ।।

स्वरों के लिए जिन चिह्नों को प्रयोग में लाया जाता है, उनके सम्बन्ध में भी बड़ा मतभेद दिखाई पड़ता है । सामान्यत: अनुदात्त के लिए अक्षर के नीचे आड़ी लकीर देने तथा स्वरित के लिए अक्षर के ऊपर खड़ी रेखा बनाने का नियम है। उदात्त का अपना कोई चिह्न नहीं, उसका इन्हीं दो स्वरों की स्थिति के अनुरूप उच्चारण किया जाता है; ये चिह्न भी प्रत्येक स्थान में एक से नहीं हैं। इस विषय में स्वर शास्त्र की खोज करने वाले एक विद्वान् श्री युधिष्ठिर मीमांसक ने अपनी पुस्तक में लिखा है – ‘वैदिक वाङ्मय के जितने ग्रन्थ प्राप्त होते हैं, उनमें उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वरों का अंकन एक जैसा नहीं है। उनमें परस्पर अत्यन्त वैलक्षण्य है। एक ग्रन्थ में जो स्वरित का चिह्न देखा जाता है, वही दूसरे ग्रन्थ में उदात्त का चिह्न माना जाता ह। इसी प्रकार किसी ग्रन्थ में जो अनुदात्त का चिह्न है, वह अन्य ग्रन्थ में उदात्त का चिह्न हो जाता है । ‘सामसंहिता’ का स्वरांकन प्रकार सभी से विलक्षण है । उसके पदपाठ का स्वरांकन संहिता के स्वरांकन से भी पूर्णरूपेण मेल नहीं खाता है। इसीलिए वेद के पाठक को पदे-पदे संदेह और कठिनाई उपस्थित होती है’।

इन तथ्यों के अतिरिक्त स्वर-चिह्न युक्त छपी वेद की पुस्तकों में एक नई समस्या प्रेस सम्बन्धी हमारे अनुभव में आई है। इनके कारण एक सामान्य पाठक के लिए मन्त्रों के पढ़ने में असुविधा होती है और अनेक बार वे गलती कर जाते हैं। इसी प्रकार जिस अक्षर के नीचे अनुदात्त’ की आड़ी रेखा लगाई गई है और उसमें ‘छोटे उ’ की मात्रा भी लगी हो तो वह भी प्राय: आँखों से ओझल हो जाती है।

उक्त कारणों से हमने प्रस्तुत संस्करण में स्वर चिह्नों का प्रयोग नहीं किया है। इनकी आवश्यकता सस्वर वेद पाठ करने में होती है और इस कार्य के लिए कई स्थानों से मूल संहिता की पुस्तकें छपी हैं। हमारा मुख्य उद्देश्य वेदों के पठन-पाठन को प्रेरणा देने का है, जिससे सामान्य से सामान्य लोग भी इस सार्वभौम धर्म के इस “मूल” को स्वयं पढ़ कर तात्पर्य समझ सकें।

इस प्रकार “स्वरों” का परित्याग कोई नई बात नहीं है, आज से लगभग १०० वर्ष पूर्व बिहार की एक धार्मिक संस्था की ओर से ‘ऋग्वेद’ का भाष्य आठ खण्डों में प्रकाशित किया गया था, जिसके लेखक “भारत धर्म महामण्डल” के महोपदेशक पं० रामगोविन्द वेदान्त शास्त्री थे। आप ने असामयिक जानकर उसमें स्वरों का प्रयोग नहीं किया था। ठीक इसी प्रकार अहमदाबाद के परमहंस श्री भगवदाचार्य ने सामवेद संहिता का भाष्य बिना स्वरों के ही किया था। प्राचीन काल में भी उपनिषद् आदि ग्रन्थों में जहाँ वेद-मंत्रों के उद्धरण दिये हैं,वहाँ स्वर चिह्न नहीं लगाये गये हैं। इन सभी का सबसे स्पष्ट उदाहरण तो “ईशावास्योपनिषद्” है, जो पूर्णत: “यजुर्वेद” के अन्तिम अध्याय की प्रतिलिपि है, जिसे सभी जगह बिना स्वर चिह्नों के ही लिखा व छापा गया है।

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

संदर्भ ग्रन्थ : अथर्ववेद-संहिता परिचय वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा

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