08- वेद परिचय : वैदिक साहित्य का वर्गीकरण

Philosophical Literatures

‘वेद’ ज्ञान निधि के समुच्चय हैं, जिन्हें ऋषियों ने अपनी अन्त: प्रज्ञा से प्रकट किया है। वह वेदराशि स्वरूप भेद के कारण वस्तुत: चार विभागों में प्रविभक्त है -संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् । संहिता में वैदिक स्तुतियाँ संग्रहीत हैं । ब्राह्मण में मंत्रों की व्याख्या तथा तत्समर्थक – प्रतिपादक प्रवचन हैं, आरण्यक में वानप्रस्थ आश्रम में कर्मरत लोकसेवियों के लिए उपयोगी अरण्यगान व विधि-विधान हैं तथा उपनिषदों में दार्शनिक व्याख्याओं का प्रस्तुतीकरण है। कालक्रम के प्रवाह में इस वर्गीकरण का लोप हो जाने से इनमें से प्रत्येक को स्वतन्त्र इकाई मान लिया गया और आज यह स्थिति है कि वेद शब्द सिर्फ संहिता के अर्थों में प्रयुक्त होता है। इन संहिताओं में ऋक् को प्रार्थना, यजुष् को यज्ञ-यागादि विधान, साम को शांति-मंगलमयगान तथा अथर्व को धर्म दर्शन तथा लोक जीवन के लिए उपयोगी जानकारी-परक माना जाता है।

एक मान्यता यह भी रही है कि वेद पहले एक ही संहिता में थे, बाद में महर्षि वेदव्यास ने उसे चार भागों में वर्गीकृत किया। वेदों का वर्गीकरण करने के कारण ही उन्हें वेदव्यास कहा गया – ( वेदान् विव्यास यस्मात् स वेदव्यास इति स्मृत: – महा० १.६३.८८)। इस आधार पर वेदों के वर्ण्य-विषय के सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत का यह श्लोक उद्धृत किया जाता है- ऋक्-यजुः-सामाथर्वाख्यान्वेदान् पूर्वादिभिर्मुखैः शस्त्रमिज्यां स्तुतिस्तोमं प्रायश्चित्तं व्यधात् क्रमात् (श्रीमद्भागवत ३.१२.३७)। अर्थात् ऋक् का विषय है- शस्त्र (होता द्वारा सामान्य ढंग से प्रयुक्त किये जाने वाले मन्त्र), यजु: का विषय है – इज्या (यज्ञ कर्म), साम का विषय है-स्तुतिस्तोम (गेय ऋचाएँ) तथा अथर्व का विषय है-प्रायश्चित्त (साधकों के निमित्त आन्तरिक एवं बाह्य शोधन- प्रक्रिया के उपचार सूत्र) ।

इस सन्दर्भ में अनके विद्वानों का कथन यह है कि महर्षि व्यास के पिता, पितामह सभी वेद चतुष्टयी के ज्ञाता थे। ‘पुरुषसूक्त’ ऋ०१०.९०९ तथा यजु०३१. ७ में कहा गया है-

तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतऽऋच: सामानि जज्ञिरे।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत।।

पुरुषसूक्त’ ऋ०१०.९०९ तथा यजु०३१. ७

अर्थात्- ‘उस विराट् यज्ञ पुरुष से ऋक, साम आदि प्रकट हुए। उसी से यजु, अथर्वादि के छन्दों का प्रकटीकरण हुआ। अस्तु, ऐसा प्रतीत होता है कि वेद का यह विभागक्रम भी अति-प्राचीन है। सम्भव है, इस विभाग क्रम का संशोधित रूप वेदव्यास ने दिया हो।

एक प्रश्न यह भी उठाया जाता है, कि वेदत्रयी है कि वेदचतुष्टयी? इसे यों समझ सकते हैं कि ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार आकाश का विभाजन २७ नक्षत्रों के रूप में भी है और १२ राशियों के रूप में भी । वर्गीकरण के अपने-अपने ढंग हैं। वेद की चार संहिताओं के सम्बन्ध में ऊपर उल्लेख किया ही जा चुका है। वेदत्रयी की मान्यता इस प्रकार है-

(१) पद्यात्मक मन्त्रों को ऋचा कहा गया है- तेषामृग् यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था*? (जै० सू० २.१.३५)I
(२) यजु गद्यात्मक हैं। उनमें वर्गों की संख्या का कोई बन्धन नहीं है (
गद्यात्मको यजुः। अनियताक्षरावसानो यजुः** ) ।
(३) साम गान परक है ‘गीतिषु सामाख्या (जै० सू०२.१.३६)। उसमें ऋचाओं को संगीत विद्या के साथ जोड़कर अधिक सरस तथा अधिक प्रभावशाली बनाया गया है।

वेद के सभी मंत्र पद्य, गद्य एवं गान इन्हीं तीन धाराओं में विभक्त हैं, इसीलिए उसे वेदत्रयी कहा जाता है। वेद की चारों संहिताओं के मन्त्रों के वर्गीकरण भिन्न-भिन्न ढंग से किये गये हैं।

वैदिक वाङ्ग्मय का नव्य भारत में अनुशीलन

प्रो० मैक्समूलर के प्रयासों के साथ-साथ भारतवर्ष में तत्कालीन समाज में दो समाज सुधारक धार्मिक संगठनों की स्थापना से वैदिक वाङ्मय के पुनरुद्धार के क्षेत्र में एक नया मोड़ आया। एक था राजा राममोहनराय द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज तथा दूसरा स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा बनाया गया आर्य समाज। पहला बंगाल में जन्मा, दूसरा गुजरात में। दोनों ने ही वैदिक सिद्धान्तों को हिन्दू अध्यात्म का मौलिक धर्म बताया एवं बहसंख्य भारतीयों का ध्यान आकर्षित किया। राजा राममोहनराय जिन्हें उपनिषदों का एक फटा पन्ना रास्ते चलते मिलने के बाद इस क्षेत्र में अध्ययन की एवं इसके विस्तार की प्रेरणा मिली; राजा राममोहनरायने ब्रह्म समाज के द्वारा औपनिषदिक शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार का तंत्र बनाया। आर्य समाज ने वैदिक संहिताओं के अध्ययन अध्यापन को प्रधानता दी। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने यजुर्वेद एवं ऋग्वेद के कुछ सूक्तों पर अपनी पद्धति में संस्कृत में भाष्य प्रकाशित किया, जो आज भी प्रामाणिक संदर्भ ग्रन्थ है।

शंकर पाण्डुरंग पण्डित ने सायण भाष्य के साथ अथर्ववेद का विशुद्ध संस्करण बम्बई से चार जिल्दों में प्रकाशित किया। लोकमान्य तिलक ने ‘ओरायन’ तथा ‘आर्कटिक होम इन दि वेदाज’ नामक दो समीक्षात्मक ग्रंथ वैदिक साहित्य पर लिखे। मौलिक गवेषणा के कारण आज भी हरेक के लिए वे पठनीय हैं । सामवेद के मार्मिक विद्वान् शंकर बालकृष्ण दीक्षित ने साम संहिता एवं गान संहिता के पाँच भागों में कलकत्ता से सन् १८७७ ई० में प्रामाणिक संस्करण प्रकाशित कर वस्तुत: देव संस्कृति की एक बड़ी सेवा की है ।

श्रीपाद दामोदर सातवलेकर (औंध-सतारा तथा पारडी-बलसाड़) ने चारों वेदों की संहिताओं को श्रमपूर्वक एक विशद् अनुक्रमणिका के साथ स्वाध्याय मण्डल से प्रकाशित कर प्रामाणिक अध्ययन को जन-जन तक पहुँचाया । इसी प्रकार तिलक विद्यापीठ पुणे से पाँच जिल्दों में प्रकाशित ऋग्वेद केसायण भाष्य को विज्ञान सम्मत एवं नितान्त शुद्ध माना जाता है। विशेष रूप से इस कारण कि यह मैक्समूलर के उपलब्ध प्रख्यात संस्करण से भी अधिक शुद्ध है।

वैदिक संहिताओं के भाषानुवाद क्रम में श्री रमेशचन्द्र दत्त का बंगाल में, रामगोविन्द त्रिवेदी एवं जयदेव विद्यालंकार का हिन्दी में तथा श्रीधर पाठक का मराठी में ग्रन्थों का प्रकाशन यहाँ उल्लेखनीय है। इन सभी अनुवादों में एक कमी यह है कि गुह्य अर्थों वाले वैदिक मंत्रों की व्यापकता एवं वैज्ञानिकता का अभाव है। साथ ही वैदिक देवी देवताओं के विस्तृत अनुशीलन एवं रूपकों की व्याख्या के न हो पाने के कारण इनसे वह मार्गदर्शन नहीं मिल पाता,जो एक जिज्ञासु पाठक को अपेक्षित रहता है । पूज्य गुरुदेव ने आर्ष ग्रन्थों के भाष्य क्रम में सबसे प्रथम संस्करण जो वेदों के अनूदित भाष्य के रूप में लिखा, वह सायण भाष्यावलम्बी सरल हिन्दी भावार्थ के साथ गायत्री तपोभूमि मथुरा से गायत्री जयंती सन् १९६० ई० को प्रकाशित किया। इस भाष्य की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह चारों वेदों पर ८ जिल्दों में प्रकाशित, सरल-सुगम भाषा में अनूदित तथा सर्वांगपूर्ण था ।

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

संदर्भ ग्रन्थ : अथर्ववेद-संहिता परिचय वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा

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