09- वेद परिचय : वेदों के भाष्यकार

Vedas

इतिहास के पृष्ठों पर दृष्टि डालने पर भट्ट भास्कर मिश्र, भरत स्वामी वेंकट माधव, उद्गीथ, स्कन्दस्वामी, नारायण, रावण, मुद्गल, उवट, महीधर, सायण आदि अनेक भाष्यकारों के नाम देखने को मिलते हैं; किन्तु उनके भाष्यों पर जब हम गहन दृष्टि डालते हैं, तो एक ही बात समझ में आती है कि वेदों के भाष्य क्रम में जब-जब पाण्डित्य हावी हुआ है , तब-तब वेदों के मर्म व रहस्यों को समझने – समझाने में गड़बड़ी हुई है। यास्क ने एक कोषकार के नाते जो वैदिक शब्दों के अर्थ दिए- वहाँ से लेकर सायण के समय तक अनेकानेक व्यक्तियों ने, भाष्य के प्रयास अपने-अपने ज्ञान एवं विवेक के आधार पर किए हैं। यास्क जहाँ पूर्वकाल के एक ऐसे विद्वान् हैं, जिनने व्याकरण प्रणालियों को आधार बनाकर वैदिक कालीन कोष हमारे समक्ष रखा है, वहाँ सायण की गणना उन उत्तरकालीन पण्डितों में होती है, जिनने एक प्रामाणिक भाष्य हम सबके समक्ष रखा। सायणाचार्य ही एक ऐसे भाष्यकार हैं, जिनके चारों वेदों के भाष्य पूर्णरूप में मिलते हैं और जिनका आधार लेकर ही देश-विदेश के विद्वानों ने वेदों को उस रूप में प्रस्तुत किया है, जैसे कि हम सबको आज दिखाई देते हैं।

यूरोप के प्रारंभकाल के वैदिक विद्वानों से लेकर श्री अरविंद एवं पूज्य गुरुदेव भी सायण द्वारा किये गये वेद भाष्य की भूरि-भूरि सराहना करते हैं। यद्यपि इस भाष्य में कर्मकाण्ड पक्ष की प्रधानता है; परन्तु फिर भी मत्रों के स्पष्ट अर्थों में छिपी सरलता-प्रामाणिकता सायण को एक पण्डित के अतिरिक्त बिना लाग-लपेट वाला एक सरल हृदयी भाष्यकार ठहराती है।

सायण की एक ही कमी रही कि उन्होंने कर्मकाण्ड के साँचे के अन्दर ही वेद के भाष्य को ढाला और एक-एक शब्द का अर्थ उसी परिप्रेक्ष्य में किया । इतने पर भी श्री अरविंद ‘वेद रहस्य’ में लिखते है कि “सायण के ग्रन्थ ने एक ऐसी चाबी का काम किया है, जिससे वेद की शिक्षाओं पर दोहरा ताला लगाने के साथ स्वयं को वैदिक शिक्षा की प्रारंभिक कोठरियाँ खोलने के लिए अत्यन्त अनिवार्य बना दिया है। सायण के भाष्य द्वारा वस्तुत: हम अपने आपको वेद की ऋचाओं के गुह्यतम आंतरिक अर्थ की गहराई में गोता लगाने के योग्य बना पाते हैं।”

चूँकि विदेशी संस्कृति के विद्वानों ने जिनमें वेदों के प्रति जिज्ञासा थी, परन्तु ऋषि प्रज्ञा के अभाव में वैदिक रूपकों को मात्र अपनी विश्लेषणात्मक बुद्धि के सहारे पढ़ने व प्रतिपादित करने की कोशिश की, वे भाष्य के साथ न्याय नहीं कर पाये। यही कारण था कि उन्होंने वेदों को “एक आदिम, जंगली और अत्यधिक बर्बर समाज की स्तोत्र संहिता” नाम दिया। यहाँ तक कहा कि वेद तो “गड़रियों के गीत” मात्र हैं, जो अनगढ़, नैतिक व पुरातन धार्मिक विचारों से भरे हुए हैं।

श्री बाल गंगाधर तिलक (आर्कटिक होम इन द वेदाज), श्री युत टी० परम शिव अय्यर (द ऋक्स्) तथा स्वामी दयानन्द सरस्वती (ऋग्वेदादि भाष्य०) ऐसे तीन विद्वान हैं, जिनने ऋग्वेद में निहित अर्थों को पाश्चात्य एवं पौर्वात्त्य परिप्रेक्ष्य में तुलनात्मक दृष्टि से देखते हुए उनकी प्राचीनता व विलक्षणता पर अपने विचार व्यक्त किए है।

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

अथर्ववेद-संहिता परिचय वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा

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