02- अथर्ववेद परिचय : अभिधान

अथर्ववेद के अनेक अभिधान

अथर्ववेद के अनेक अभिधान (नाम) वैदिक वाङ्मय में प्राप्त हैं, यथा-अथर्ववेद, ब्रह्मवेद, अमृतवेद, आत्मवेद, अंगिरोवेद, अथर्वाङ्गिरस वेद, भृग्वांगिरसवेद आदि। अथर्व का निर्वचन प्रस्तुत करते हुए निरुक्त का कथन है – ‘थर्व’ धातु कुटिलता (थर्व कौटिल्ये), गतिशीलता, हिंसा आदि अर्थों में प्रयुक्त होती है। अतएव ‘अथर्व’ का अर्थ हुआ अकुटिलता तथा अहिंसावृत्ति से चित्त की स्थिरता प्राप्त करने वाला। ‘अथर्वन्’ का एक अर्थ अग्नि को उद्बोधित करने वाला ‘पुरोहित’ भी होता है । सम्भवत: ‘अवेस्ता’ का ‘अथ्रवन्’ (अग्निपूजक) शब्द ‘अथर्वन्’ का प्रतिनिधित्व करता है।

अथर्ववेद को ‘ब्रह्मवेद’ भी कहते हैं । वस्तुत: यह वेद ‘यज्ञ संसद’ के प्रमुख ‘ब्रह्मा’ के प्रयोगार्थ निर्धारित है। वैसे ‘ब्रह्मा’ के लिए चारों वेदों का निष्णात होना विहित है; परंतु ‘अथर्ववेद’ की विशेषज्ञता उनके लिए अनिवार्य है क्योंकि ‘ब्रह्मवेद’ में वह सब कुछ है, जो चारों वेदों में पृथक्-पृथक् प्राप्त होते हैं ( ब्रह्मवेद एव सर्वम् – गो०ब्रा० १.५,१५) ।

अतएव ‘ब्रह्मा’ के ‘ब्रह्मकर्म’ की प्रमुखता के कारण इसे ‘ब्रह्मवेद’ की अन्वर्थ संज्ञा प्राप्त है । गोपथ ब्राह्मण, छान्दोग्योपनिषदादि ग्रन्थों में भी अथर्ववेद को ब्रह्मवेद की संज्ञा प्रदान की गई है।

‘अथर्व’ की प्राचीन संज्ञा ‘अथर्वांगिरस वेद’ भी है। इससे इसका सम्बन्ध ‘अथर्व’ और ‘अंगिरा’ दो ऋषिकुलों से संयुक्त प्रतीत होता है। वस्तुत: अंगिरावंशीय अथर्वा ऋषि के द्वारा प्रस्तुत रूप प्रदान किये जाने के कारण इस वेद को ‘अथर्वांगिरस वेद’ कहा जाता है । यहाँ पर एक बात और ध्यातव्य है कि ‘अथर्व दृष्ट’ मन्त्र शान्ति और पुष्टि कर्मयुक्त हैं और अंगिरस्-दृष्ट मन्त्र आभिचारिक हैं। प्रथमत: शान्ति – पौष्टिक मन्त्र हैं, बाद में आभिचारिक मन्त्रों का समावेश है। इसलिए अथर्वांगिरस (अथर्व + अंगिरस) संज्ञा सार्थक है।

‘अथर्ववेद’ को ‘भृग्वांगिरस वेद’ भी कहते हैं। ‘भृगु’ अंगिरा के शिष्य थे। अथर्ववेद के प्रचार-प्रसार का प्रमुख श्रेय ‘भृगु’ को ही प्राप्त है, अत: इसे भृग्वांगिरस वेद की संज्ञा प्राप्त हई और सर्वश्रेष्ठता भी- एतद्वै भूयिष्ठं ब्रह्म यद् भृग्वंगिरसः (गो०ब्रा० १.३.४)

अथर्ववेद की उक्त संज्ञाओं के अतिरिक्त कुछ और भी संज्ञाएँ हैं -यथा, छन्दोवेद (छन्दांसि-अथर्व० ११.७.२४), महीवेद (ऋच: साम यजुर्मही- अथर्व० १०.७.१४), क्षत्रवेद (उवथं -यजु…साम… -क्षत्रं…- वेद-शत० ब्रा०१४.८.१४. २-४) तथा भैषज्य वेद (ऋच: सामानि भेषजा। यजूंषि होत्रा ब्रूम:- अथर्व०११.६.१४)। अथर्ववेद के ये सभी अभिधान उसके व्यापक वर्ण्य विषय को स्पष्ट करते हैं।

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

संदर्भ ग्रन्थ : अथर्ववेद-संहिता परिचय वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा

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