08- अथर्ववेद परिचय : मंत्रार्थ की शैली

अथर्ववेद – मंत्रार्थ की शैली

अथर्ववेद का सूत्र ग्रंथ ‘कौशिक सूत्र’ है। उसमें मंत्रों के विशिष्ट प्रयोगों का उल्लेख किया गया है। आचार्य सायण ने मंत्रों के अर्थ बहुधा कौशिक सूत्र में वर्णित उनके प्रयोगों के आधार पर किये हैं। आचार्य सायण की प्रतिभा एवं महत्ता को नमन करते हुए भी यह कहना पड़ता है कि मंत्रार्थ की यह शैली सटीक नहीं है। किसी मंत्र का अर्थ अलग बात है तथा उसका उपयोग किसी विशिष्ट प्रक्रिया में किया जाना कुछ और ही बात है । जैसे- पुरुष सूक्त के मन्त्रों से षोडशोपचार पूजन करने की परम्परा है। सूक्त में वर्णित परमपुरुष परमात्मा की विराट् सत्ता का चिंतन करते हुए पूजन की क्रियाएँ सम्पन्न करना बिल्कुल ठीक है; किन्तु यदि विभिन्न मन्त्रों के अर्थ उनके साथ की जाने वाली क्रियाओं के अनुसार किया जायेगा, तो पुरुष सूक्त के साथ न्याय नहीं हो सकता। ‘नाभ्याऽसीद् अन्तरिक्षं’ मंत्र का अर्थ नैवैद्य चढ़ाने की क्रियापरक कैसे हो सकता है? *’सप्तास्यासन्परिधयस्त्रि; सप्त समिधः कृताः’* मंत्र से परिक्रमापरक अर्थ कैसे निकलेगा?

सभी लोग जानते हैं कि राष्ट्रीय ध्वज फहराते ही सभी लोग सलामी देते हुए राष्ट्रगान गाते हैं। इस आधार पर यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान का अर्थ झण्डा फहराने तथा सलामी देने की क्रियापरक करने लगे, तो बात कैसे बनेगी? झण्डे की सलामी की प्रक्रिया के साथ राष्ट्रगान गाने की परम्परा सही होते हुए भी, उसका अर्थ उस प्रक्रिया से अलग ही होगा। अस्तु, अथर्ववेद के मंत्रार्थ में कौशिक सूत्र में वर्णित प्रयोगपरक अर्थों की ओर जबरदस्ती मोड़ना उचित नहीं प्रतीत होता।

इसी प्रकार कुछ अर्वाचीन विद्वानों ने मंत्रों के अर्थआग्रहपूर्वक आध्यात्मिक संदर्भ में ही किये हैं। कुछ मंत्र जो क्रियापरक हैं, उनके भी आध्यात्मिक अर्थ निकल तो आते हैं, किन्तु मन्त्रार्थों की स्वाभाविकता उससे खंडित होती है। प्रस्तुत भाषानुवाद में मंत्रों की स्वाभाविक धारा को बनाये रखकर, उनके अर्थ करने का प्रयास किया गया है। वेदमंत्र अनेकार्थक तो होते ही हैं। आलंकारिक ढंग से, किन्हीं स्थूल वस्तुओं या प्रक्रियाओं के हवाले से गूढ़ रहस्यों को समझाना ऋषियों की विशेषता रही है। द्रष्टाओं के उदाहरण को भी ठीक से समझ पाना बड़ा कठिन होता है। उन्हें भाष्य-शैली में स्पष्ट करना भी कठिन होता है, भाषार्थ शैली में तो यह कार्य और भी दुरूह हो जाता है। फिर भी यथास्थान टिप्पणियों द्वारा उन्हें स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है, ताकि अध्येताओं को उन काव्यात्मक अलंकारों के भाव समझने में सुविधा हो इसे वेदभगवान् की कृपा ही कहा जा सकता है।

मणि– अनेक प्रकार की मणियों का प्रयोग तथा उनकी महत्ता अथर्ववेद के अनेक सूक्तों में वर्णित है। मणि को तैयार करने, प्राप्त करने तथा धारण करने के स्पष्ट उल्लेख मिलते हैं। मणि सम्बोधन वेद में व्यापक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। वनस्पतियों एवं ओषधियों से निर्मित मणियों का भी उल्लेख है। उन्हें मंत्रशक्ति से अनुप्राणित भी किया जाता है; किन्तु कुछ मणियों को तो दिव्य गुणों-दिव्य शक्तियों के रूप में ही मानना पड़ता है। यह परम्परा भारतीय वाङ्मय में रही भी है । जैसे रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है-

‘रामनाम मणि दीप धरु जीह देहरी द्वार’* तथा *’मंत्र महामणि विषय ब्याल के….’

उक्त पदों में रामनाम एवं मंत्रादि को मणि कहा गया है। अथर्ववेद में भी साक्त्यमणि (८.५.३) एवं त्रिसंध्या मणि आदि संबोधन ऐसी ही शक्ति बीजरूप मणियों के लिए प्रयुक्त प्रतीत होते हैं। मणि प्रसंगों में संदर्भानुसार उनके स्वरूप को स्पष्ट करते हुए मंत्रार्थ खोलने का प्रयास किया गया है।

मातृनामा -मातृनामा का उल्लेख सूक्त ४.२० के ऋषि एवं देवता के रूप में किया गया है। कुछ आचार्यों ने इस सम्बोधन को मंत्रों में वर्णित त्रिसन्ध्या एवं सदम्पुष्पा मणियों से जोड़ा है। हितकारिणी ओषधियों को मातृनामा (माता जैसे- प्रभावशाली) कहना उचित है। फिर भी विभिन्न मंत्रों में उनके प्रभाव के विवरण के आधार पर उन्हें मातृसत्तात्मक दिव्य प्रवाह ही मानना युक्तिसंगत लगता है। इस अवधारणा के आधार पर मंत्रार्थ स्वाभाविक रूप में सिद्ध हो जाते हैं।

कृत्यादूषण – अनेक सूक्तों के देवता के रूप में यह सम्बोधन प्रयुक्त हुआ है। कृत्यादूषण – ‘कृत्या’ अथवा उसके प्रभाव को नष्ट करने के प्रयोग अनेक स्थानों पर आये हैं। कृत्य’काअर्थ होता है,करने योग्य क्रिया और कृत्या दूषण का अर्थ हुआ किये हुए की प्रतिक्रिया। इस आशय से ‘कृत्या’ का प्रयोग भले-बुरे दोनों अर्थों में किया जा सकता है, किन्तु ‘कृत्या’ शब्द का प्रयोग किसी हानिकारक मारक शक्ति के रूप में ही किया जाता रहा है । शत्रुनाश के लिए ‘कृत्या’ प्रयोग तो निश्चित रूप से ‘मारक’ संकल्प के साथ किये गये कार्यों के वाञ्छित प्रतिफलों के साथ कुछ अवाञ्छित फल भी निकल पड़ते हैं, उन्हें भी ‘कृत्या’ कह सकते हैं। जैसे समुद्र मन्थन रत्नों की प्राप्ति के संकल्प के साथ किया गया था; किन्तु उससे हलाहल विष भी निकल पड़ा, अच्छे उत्पादन के प्रयास में फैक्ट्रियों से प्रदूषण भी निकल पड़ता है। मनुष्य में कर्म संकल्प एवं कर्मशक्ति के विकास के लिए काया, इन्द्रियाँ तथा कामनाएँ आवश्यक हैं। उनके इष्ट प्रयोगों के साथ अनिष्ट प्रयोग भी होने लगते हैं, उन्हें भी ‘कृत्या’ कह सकते हैं। प्रजनन द्वारा सृष्टि कार्य आगे बढ़ाने के लिए प्रदत्त कामशक्ति, कामवासना बनकर अनिष्टकारी बन जाती है, उसे भी ‘कृत्या’ कह सकते हैं। इस प्रकार कृत्या के स्थूल-सूक्ष्म अगणित स्वरूप सिद्ध हो सकते हैं।

किसी उपजी ‘कृत्या’ अथवा ‘कृत्यादूषण’ का शमन आवश्यक हो जाता है। वेद द्वारा कुत्या निवारण को इसी प्रकार के व्यापक संदर्भ में लेने से वेदमंत्रों के अर्थ भली प्रकार प्रकट हो सकते हैं। किसी एक परम्परा में प्रयुक्त प्रयोगों तक उसे सीमाबद्ध करना उचित नहीं लगता, अस्तु, प्रस्तुत वेदार्थ में परम्परा के साथ व्यापक प्रयोगों को समाहित रखने का प्रयास किया गया है।

ब्रह्मजाया – अथर्व० ५.१७ में देवता ब्रह्मजाया का वर्णन है। जाया का सीधा अर्थ पत्नी होता है। ब्रह्म की पत्नी अथवा ब्राह्मण की पत्नी के संदर्भ से संगति ठीक-ठीक बैठती नहीं। उसे ‘ब्रह्मविद्या’ के संदर्भ में लेने से मंत्रार्थों की गरिमा तथा परम्परागत अर्थ दोनों की संगति ठीक बैठ जाती है।

ब्रह्मगवी :-सूक्त ५.१८ के देवता रूप में वर्णित ब्रह्मगवी का अर्थ ब्राह्मण की गाय अधिकांश विद्वान करते हैं। गौ माता के प्रति श्रद्धा तथा उनकी महत्ता बढ़ाने के लिए मंत्रों में वर्णित असामान्य प्रभावों को ‘गौ’ से जोड़ना उचित भी है; किन्तु मन्त्रों के भाव इस अर्थ के साथ ठीक प्रकार सिद्ध नहीं होते। ब्राह्मण की गाय जो उसको पोषण देती है, वह उसकी निष्ठा- प्रवृत्ति है। इसलिए ‘ब्रह्मगवी’ का अर्थ *’ब्रह्म वृत्ति’* लेने से ही बात बनती है। इसी प्रकार ‘शतौदना’ गौ, वशा गौ, स्कम्भ आदि के बारे में व्यापक पूर्वाग्रहमुक्त होकर ही अर्थ करने पड़े हैं, अध्येताओं को उनसे तुष्टि के साथ नयी दृष्टि भी मिल सकेगी, ऐसी आशा है। मंत्रों के बीच-बीच में भी आलंकारिक प्रयोगों को टिप्पणियों के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। जैसे अथर्व० ४.७.३ में रोगी को परामर्श दिया गया है कि भूख के अनुसार करंभ(औषधियुक्त खाद्य का मिश्रण) खाने और पीवपाक (चर्बी पकाने) विधि का प्रयोग तुम्हे विष प्रभाव से बचा लेगा। यहाँ चर्बी पकाने की विधि का यह स्पष्टीकरण आवश्यक है- अन्यथा कोई नासमझ चर्बी पकाकर उसका करंभ(मिश्रण) बनाकर शारीरिक विषों से मुक्ति चाह सकता है। पाद टिप्पणी में यह बात स्पष्ट कर दी गयी है कि भरपूर श्रम, जिससे शरीर की चर्बी गलने लगे, ऐसे प्रयोग को ‘पीवपाक’ कहा जाना युक्तिसंगत है। स्थान-स्थान पर ऐसे स्पष्टीकरण देने वाली टिप्पणियों का संतुलित प्रयोग किया गया है।

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

संदर्भ ग्रन्थ : अथर्ववेद-संहिता परिचय वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा

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