01- अथर्ववेद परिचय : भूमिका

अथर्ववेद संहिता : महत्त्व एवं उपयोगिता

वेद के प्रत्येक विभाग की तरह अथर्ववेद की अपनी कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं, जिनके आधार पर अनेक वेदज्ञ उसे अतुलनीय मानते हैं । वेद की अन्य शाखाओं में अपनी-अपनी विशिष्ट दिशाएँ हैं, किन्तु अथर्ववेद तो अपने अंक में मानो जीवन की समग्रता को समेटे हुए है। सृष्टि के गूढ़ रहस्यों, दिव्य प्रार्थनाओं, यज्ञीय प्रयोगों, रोगोपचार, विवाह, प्रजनन, परिवार, समाज-व्यवस्था एवं आत्मरक्षा आदि जीवन के सभी पक्षों का इसमें समावेश है । वेद की अन्य धाराओं में गूढ़ ज्ञान के साथ शुद्ध विज्ञान (प्योर साइंस) है; किन्तु अथर्ववेद में ज्ञान-विज्ञान की गूढ़ धाराओं के साथ व्यावहारिक विज्ञान (एप्लाइड साइंस) भी है।

जीवन को सुखमय तथा दुःखविरहित बनाने के उद्देश्य से ऋषियों ने जिन यज्ञीय अनुष्ठानों का विधान बनाया है, उनके पूर्ण निष्पादन के निमित्त जिन चार ऋत्विजों की आवश्यकता बताई है, उनमें से अन्यतम (प्रमुख) ऋत्विज् बह्मा का प्रत्यक्ष सम्बन्ध इसी वेद से है। “ब्रह्मा” का स्थान यज्ञ-संसद के ऋत्विजों में प्रधान (अध्यक्ष) है। ‘ब्रह्मा’ का दायित्व यज्ञीय नाना विधियों का निरीक्षण तथा त्रुटियों का परिमार्जन करना है। इसके लिए उसको सर्ववेदविद् होना अनिवार्य होता है तथा उसे मनोबल-सम्पन्न भी होना चाहिए। गोपथ ब्राह्मण का कथन है कि तीनों वेदों के द्वारा यज्ञ के केवल एक पक्ष का संस्कार होता है । ‘ब्रह्मा’ मन के द्वारा यज्ञ के दूसरे पक्ष का संस्कार करता है।

ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार यज्ञ सम्पादन के दो मार्ग हैं- वाक् तथा मन । वाक् (वचन) के द्वारा वेदत्रयी (ऋक्, यजु, साम) यज्ञ के एक पक्ष को संस्कारित करती है, दूसरे पक्ष का संस्कार ‘ब्रह्मा’ ब्रह्मवेद (अथर्ववेद) के द्वारा ‘मन’ से करता है। इस तथ्य से स्पष्ट है कि यज्ञ के पूर्ण संस्कार के लिए अथर्ववेद की नितान्त आवश्यकता है।

वस्तुत: अथर्ववेद में शान्ति-पुष्टि तथा आभिचारिक- दोनों तरह के अनुष्ठान प्रयोग वर्णित हैं। राजा के लिए इसका विशेष महत्त्व स्वीकार किया गया है। राजा के लिए शान्तिक – पौष्टिक कर्म तथा तुलापुरुषादि महादान की विशेष आवश्यकता पड़ती है। जो अथर्ववेद का मुख्य प्रतिपाद्य है। मत्स्य पुराण का कहना है कि पुरोहित को अथर्वमन्त्र तथा बाह्मण में पारंगत होना चाहिए। अथर्वपरिशिष्ट में तो यहाँ तक लिखा है कि अथर्ववेद का ज्ञाता शान्तिकर्म का पारगामी (पुरोहित) जिस राष्ट्र में रहता है, वह राष्ट्र उपद्रवों से हीन होकर वृद्धि को प्राप्त करता है। इसलिए राजा को चाहिए कि वह अथर्ववेदविद् तथा जितेन्द्रिय पुरोहित का दान-सम्मान, सत्कारपूर्वक नित्यप्रति पूजन-अर्चन करे।

अथर्ववेद की इसी महत्ता को ध्यान में रखकर सम्भवत: कुछ आचार्यों ने इसे प्रथम वेद के रूप में स्वीकारा है।

न्याय मञ्जरी कर्ता जयन्त भट्ट ने लिखा है- तत्र वेदाश्चत्वारः प्रथमोऽथर्ववेदः (न्याय मंजरी पृ०२३७-२३८ चौ० प्र०)। नागर खण्ड भी इसे आद्यवेद मानते हुए तर्क देता है कि सार्वलौकिक कार्यसिद्धि में अथर्व ही मुख्य रूपेण प्रयुक्त होता है, इसलिए वह ‘आद्य’ कहलाता है । ऐहिक जगत् के लिए फलदायक होने से भी इसे ‘आद्य’ कहते होंगे, जबकि अन्य तीनों वेद पारत्रिक-आमुष्मिक (पारलौकिक) फलदायक होने से दूसरे स्थान पर आते हैं। आचार्य सायण ने तो अपने अथर्ववेद की भूमिका में यहाँ तक लिखा है कि आमुष्मिक (पारलौकिक) फलदायी वेदत्रयी की व्याख्या के बाद, ऐहिक (ऐहलौकिक) और आमुष्मिक दोनों प्रकार के फल प्रदान करने वाले चतुर्थ वेद (अथर्ववेद) की व्याख्या करूंगा।’

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

संदर्भ ग्रन्थ : अथर्ववेद-संहिता परिचय वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा

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