09- अथर्ववेद परिचय : रहस्यात्मक प्रसंग

अथर्ववेद संहिता – कुछ रहस्यात्मक प्रसंग

वेद यों तो सारे के सारे गूढ़ हैं, उनके मर्म को समझना कठिन है, फिर भी उनकी भाषा के आधार पर उनके भावों को कुछ अंशों तक समझ लिया जाता है; किन्तु अथर्व में ऐसे अनेक रहस्यात्मक प्रकरण हैं, जिनको न समझ पाने के कारण भ्रम उत्पन्न होते हैं।

जादू टोने का भ्रम – अथर्ववेद में बाधाओं से बचने तथा दुष्टों के दमन के क्रम में अनेक रहस्यात्मक प्रयोगों का उल्लेख है। कुछ विदेशी विद्वान् इस आधार पर इसमें जादू – टोना होने का आरोप लगाते हैं, कुछ लोग इसे दूसरों को हानि पहुँचाने की हीन- विधाओं का समर्थक कहते हैं, किन्तु विवेकपूर्ण समीक्षा से ऐसे सब आरोप निरर्थक सिद्ध हो जाते हैं।

सब जानते हैं, कि संसार में भले-बुरे सभी तरह के लोग भी हैं तथा अच्छे-बुरे सभी तरह के स्थूल-सूक्ष्म प्रवाह भी हैं। स्वयं को सदाचारी बनाकर नीतिनिष्ठ तथा समर्थ बनाना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है, दुष्टवृत्तियों-दुष्प्रयासों से अपने आप को बचाना। इसके लिए आत्मरक्षा के उपायों के साथ-साथ कभी-कभी आक्रामक रुख बनाना पड़ता है। रोग से बचने के साथ-साथ रोग पर मारक आक्रमण भी करने पड़ते हैं । दुरुपयोग से तो बुद्धि भी कुचक्र रचने वाली बन जाती है और सदुपयोग करने से घृणा भी दोषों से बचा लेती है। अस्तु , विकारों तथा विकृत प्रक्रियाओं को नष्ट करने के प्रयासों को हीन प्रक्रिया नहीं कहा जा सकता। उस विद्या का भी विवेकपूर्ण उपयोग समय-समय पर अत्यंत आवश्यक हो जाता है। जादू तो हमारे अज्ञान का परिचायक है । लोग विज्ञान के तथा हाथ की सफाई के तमाम कौशल दिखाते हैं । समझने वालों के लिए वे कौशल, सुनिश्चित प्रक्रियाएँ हैं और न समझ पाने वालों के लिए जादू हैं।

यदि किसी ने ‘इलैक्ट्रोस्टेट’ मशीन न देखी हो और कोई जानकार उसे समझाए कि यहाँ से सादा कागज डालो – उधर से छपा हुआ निकाल लो, तो अनजान व्यक्ति यही कहेगा कि जादूगरी करके हमें बहका रहा है; किन्तु सत्य तो सत्य है, जो उसे जानता है, वह तो व्यक्त करने का प्रयास करेगा ही। वेद में ऋषियों ने अपनी सांकेतिक भाषा में (जो उस समय सहज ग्राह्य रही होगी) उपयोगी बातें बतलायी हैं। हमारी बुद्धि जितना समझ पाए, उसका लाभ उठाए; किन्तु जो बातें हम समझ नहीं पाते, उन्हें किन्हीं हीन परिकल्पनाओं से जोड़ना उचित नहीं। दूसरी बात यह है कि जादू शब्द हमेशा बुरे अर्थों में ही प्रयुक्त नहीं होता। यदि कोई बालक या व्यक्ति किसी भी प्रकार कोई उचित बात समझ नहीं रहा है, ऐसे में कोई मनोवैज्ञानिक मेधा- सम्पन्न व्यक्ति उसे सहमत कर ले, तो लोग हर्षित होकर कह उठते हैं वाह ! इसने तो जादु कर दिया। माँ का – संतों का अपनत्व भरा व्यवहार ऐसे जादू करता ही रहता है। उपचार पद्धतियों में आज भी अनेक प्रक्रियाएँ जादू जैसी लगती हैं। होम्योपैथी में रसायन विज्ञान (कैमिस्ट्री) के हिसाब से देखें, तो १००० शक्ति (पौटैन्सी) की दवा में एक घन सेन्टीमीटर द्रव में मुश्किल से ओषधि का एक कण (मालीक्यूल) आता है। उस द्रव की छोटी बूंद में तो दवा कुछ भी नहीं रह जाती,फिर वह असर कैसे करती है ? यह बात समझ में न आने से जादू जैसी लगे भले, किन्तु है तो एक सूक्ष्म विज्ञान के अनुशासन में ही। इसी प्रकार एक्सरे, इंफ्रारेड, अल्ट्रा वायलेट एवं लेसर किरणों से किया जाने वाला उपचार अज्ञानियों को जादू जैसा लगे भले ही, किन्तु है तो वह विज्ञान सम्मत प्रक्रिया ही।’

वेदकाल में ऐसी सूक्ष्म चिकित्साओं की श्रेणी में प्राण तथा मन्त्र की सूक्ष्म धाराओं का प्रयोग सहज ही किया जाता रहा है । वे शक्तियाँ पवित्र जीवन जीने वाले, प्रकृति के संसर्ग में रहने वाले तपस्वी स्तर के व्यक्तियों को सहज उपलब्ध रहती थीं। अत: वे ओषधियों, मणियों आदि के साथ उन सूक्ष्म धाराओं को संयुक्त करके उपचार किया करते थे। आज वह प्रक्रिया हमारे लिए दुरूह हो गयी है, तो भी उसे नकारा नहीं जा सकता। अथर्ववेद में ऐसे प्रसंग भी पर्याप्त है। मन्त्रार्थों में ऐसे प्रसंगों को चेतना विज्ञान की ऐसी धाराएँ मानकर चला गया है, जो फिलहाल स्पष्ट नहीं हो पायी है।

दुर्बोध शब्दावली – अथर्ववेद में अनेक ऐसे मन्त्र हैं, जिनके अर्थ एवं उद्देश्य तो सहज ही स्पष्ट हो जाते हैं, किन्तु उनमें जिन शब्दों का प्रयोग किया गया है, उनके अर्थ खोजे नहीं मिलते। निरुक्तकार यास्क भी उस संदर्भ में मौन हैं। ताबुव एवं तस्तुव के सर्पविषनाश की बात बहुत स्पष्टता से कही गयी है, किन्तु ये क्या हैं ? अब तक किसी व्याख्याकार की समझ में नहीं आया। इसी प्रकार के कुछ शब्द हैं – खृगल, विशफ, काबव, कर्शफ आदि। ओषधि प्रयोगों में अनेक ऐसी ओषधियों का वर्णन किया गया है, जिनका उल्लेख किसी भैषज्यग्रंथ में नहीं मिलता, जैसे अरंधुष, अरुन्धती, उपजीका, अश्ववार आदि । मणियों के संदर्भ में भी जंगिड़ मणि, प्रतिसरमणि अस्तृतमणि की भावात्मक व्याख्या करके ही चुप रह जाना पड़ता है। आलंकारिक, सांकेतिक शब्दावली जैसे – कोकयातु (चक्रवाक पक्षी जैसी कामवृत्ति),सुर्पायातु (गरुड़ जैसा दर्प), श्वयातु (कुत्ते की तरह जातिद्रोह) आदि को यथा स्थान स्पष्ट किया गया है।

अथर्ववेद २०वें काण्ड के सूक्त क्र० १२७ से क्र० १३६ तक के सूक्तों को *कुन्ताप सूक्त* कहते हैं। कुछ विद्वान् इन्हें ‘खिल’ (प्रक्षिप्त) मानते हैं; किन्तु कालान्तर में इन्हें संहिता का ही अंग स्वीकार कर लिया गया ह। आचार्य सायण के भाष्य में इन सूक्तों पर भाष्य प्राप्त नहीं है, अथर्ववेद के ही कुछ अन्य सूक्तों पर भी उनके भाष्य प्राप्त नहीं हैं। हो सकता है कि उनके भाष्य के कुछ अंश काल-प्रभाव से नष्ट हो गये हों ? जो भी हो, किन्तु अब वे सभी मान्यता प्राप्त संहिताओं में हैं तथा अध्येताओं-विद्वानों के लिए चुनौती भरे आकर्षण बने हुए हैं। सभी ने उन्हें दुरूह-दुर्बोध माना है। गोपथ ब्राह्मण, उत्तरभाग, प्रपाठक ६, कण्डिका १२.४ में कुन्ताप का अर्थ *’कुयान् तप्यन्ते’* कुत्सित- निन्दित (पापों) को तापित (तपाकर भस्म) करने वाला बतलाया गया है। इससे यज्ञानुष्ठान कर्त्ता के पापों को भस्म किया जाता है। वैतान सूत्र (६.२) के अनुसार इसका प्रयोग सोमयागों के छठवें दिन ‘पृष्ठ्य’ स्तुतियों के रूप में किया गया है। सूत्रकार ने इस सूक्त समुच्चय के सूक्तों को इस प्रकार अलग-अलग विभागों में विभक्त किया है – सू० क्र० १२७-२८ कुन्ताप; सू० क्र० १२९,३०,३१,३२ एतश, सू० क्र० १३३ प्रवह्लिका, सू० क्र० १३४ प्रतिराधा, सू० क्र.१३५ अतिवाद तथा सू० क्र० १३६ आहनस्य कहे गये हैं।

इन सूक्तों में गेय पद वाले मंत्रों से लेकर एक-एक शब्द वाले मन्त्र तक हैं। जैसे – प्ररित्रय: (१२९.८) पृदाकव: (१२९.९), पाकबलिः, शाकबलि: (१३१.१५-१६) आदि।

भारत की ऋषि-परम्परा में यह कोई अनहोनी बात नहीं है। तत्त्वदशी ऋषियों ने तो उच्चारण एवं भावना या संकल्पशक्ति के संयोग से कार्य करने वाले एकाक्षर मंत्र (ह्रीं, श्री, क्लीं, हुं आदि) भी रचे हैं, तो एक शाब्दिक मंत्रों को अटपटा क्यों माने ? एकाक्षर मंत्रों की तरह इनके भी प्रयोग हो सकते हैं; किन्तु शब्द में अर्थात्मक सूत्र भी सन्निहित होते हैं, उन्हें खोलने में कठिनाई होना स्वाभाविक है, फिर भी देशकाल की आवश्यकता के अनुरूप वेद मंत्रों ने अपना जितना स्वरूप खोला है, उतने को भावानुरूप भाषा देने का प्रयास किया गया है। सभी वेदों की तरह अथर्ववेद में भी पदार्थ विज्ञान, मनोविज्ञान एवं चेतना विज्ञान के गूढ़ रहस्यों को सांकेतिक विधि से व्यक्त किया गया है । आशा है इस प्रयास से जनसामान्य को वेदज्ञान का लाभ उठाने तथा गहन अध्येताओं को शोध के नये आयाम प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। सभी को वेदों की सांस्कृतिक गरिमा तथा उपयोगिता का बोध हो सकेगा।

गायत्री तपोभूमि से वेदों के प्रथम सर्वसुलभ संस्करण प्रकाशित करते समय पू० गुरुदेव ने इच्छा व्यक्त की थी कि समय आने पर विशिष्ट टिप्पणियों सहित वेदों के नये संस्करण छापेंगे। उसके लिए वे ऐसे सूत्र बनाकर दे गये थे, जिनके आधार पर इस कार्य का सम्पन्न होना संभव हुआ। वे शरीर के बंधनों में आबद्ध रहकर भी सहस्रों बुद्धियों तथा हाथों से कार्य लेते रहे, उन बन्धनों से मुक्त होकर तो उनकी वह शक्ति और भी प्रखर हो उठी। उन्होंने मानों हाथ पकड़ कर यह सब करा लिया। ‘नेति-नेति’ कहे जाने वाले तत्त्व को उन्होंने किस मर्यादा के अनुसार कितना खोला, यह तो वे ही जानें, किन्तु पंचभूतों की यह काया अपनी आयु समाप्त होने के पूर्व उनकी कठपुतली के रूप में अपनी यह भूमिका भी निभा पायी, इसका संतोष अवश्य है।

आनो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

अथर्ववेद-संहिता परिचय वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा

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