06- अथर्ववेद परिचय : विषय – विभागक्रम

अथर्ववेद का विषय – विभागक्रम

अथर्व संहिता का विभाग क्रम दो प्रकार से है- १. काण्ड, सूक्त तथा मन्त्र और २. काण्ड, अनुवाक, प्रपाठक, सूक्त तथा मन्त्र। सम्पूर्ण अथर्ववेद २० काण्डात्मक है । काण्ड, सूक्त और मन्त्र का विभाजन ही सुगम और सर्वमान्य प्रतीत होता है। दूसरा काण्ड, अनुवाक, प्रपाठक, सूक्त और मन्त्रात्मक विभाजन पारायण (पाठ) की सुविधा के लिए किया गया प्रतीत होता है, जो आज उतना लोकप्रिय नहीं है, न सुविधापूर्ण ही। अथर्ववेद को रचनाक्रम की दृष्टि से चार भागों में बाँटा जा सकता है-

(i) प्रथम भाग – (१ से ७ काण्ड) – इस विभाग में छोटे-छोटे सूक्त हैं। प्रथम काण्ड के प्रत्येक सूक्त में ४ मन्त्र, द्वितीय काण्ड में ५ मंत्र, तृतीय काण्ड में ६ मन्त्र, चतुर्थ काण्ड में ७ मन्त्र तथा पंचम काण्ड में ८ मन्त्र हैं। षष्ठ काण्ड के प्रत्येक सूक्त में कम से कम ३ मन्त्र हैं । सप्तम काण्ड में अधिकांशत: सूक्त १ या २ मन्त्र के ही हैं।

(ii) द्वितीय भाग (८ से १२ काण्ड) – ये सभी काण्ड बड़े-बड़े सूक्तों वाले हैं, परंतु प्रत्येक काण्ड एवं सूक्तों के विषय भिन्न-भिन्न विषयों वाले हैं। १२वें काण्ड के प्रारम्भ में पृथ्वी-सूक्त है, जो ६३ मन्त्रों वाला है, जिसमें भौगोलिक परिदृश्यों एवं राजनैतिक सिद्धांतों का वर्णन है।

(ii) तृतीय भाग (१३ से १८ काण्ड) – इस भाग के प्रत्येक काण्डों के सूक्तों में विषयों की एकरूपता है। १३वें काण्ड में अध्यात्म विषयक मन्त्र हैं। १४वें काण्ड में विवाह विषयक मन्त्र है। १५वें काण्ड में व्रात्यों के यज्ञ विषयक आध्यात्मिक मन्त्र हैं। १६ वें काण्ड में दुःस्वप्ननाशक मन्त्र हैं। १७ वा ३० मन्त्रों वाला एक सूक्तात्मक है, जिसमें सम्मोहन मन्त्र है । १८वें काण्ड में अन्त्येष्टि एवं पितृमेध विषयक मन्त्र है।

(iv) चतुर्थ भाग(१९ से २० काण्ड) -१९वें काण्ड में भैषज्य, राष्ट्रवृद्धि तथा अध्यात्म विषयक मन्त्र हैं। २०वें कांड में सोमयाग विषयक मन्त्र है तथा अधिकांश मन्त्र ऋग्वेद के हैं अथवा ऋग्वेद की ऋचाओं से साम्य रखते हैं।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि अथर्ववेद के मन्त्र तीन प्रमुख विषयों का प्रतिपादन करते हैं –

(i ) भेषज अर्थात् रोग दूर करने वाली ओषधियों का प्रतिपादन (ii) अमृत अर्थात् मृत्यु को दूर करने के साधन का प्रतिपादन और (ii) ब्रह्म अर्थात् बृहद् – सर्वश्रेष्ठ ज्ञान का प्रतिपादन। एक वाक्य में अथर्ववेद के मंत्रों का माहात्म्य अथवा वर्ण्यविषय का प्रतिपादन करते हुए अथर्व परिशिष्टकार ने लिखा है –

अथर्वमंत्रसम्प्राप्त्या सर्वसिद्धिर्भविष्यति (अथर्व.परि.२.५) अर्थात् अथर्ववेदमंत्र की सम्प्राप्ति (सम्यक् ज्ञान) से सब पुरुषार्थ सिद्ध होंगे।

वर्ण्य विषय -अथर्ववेद के वर्ण्य विषयों का क्षेत्र बहुत व्यापक है । सायणाचार्य ने उसको १४ विभागों में विभक्त किया है। बाद में अध्येता विद्वानों की सूची में २९ विषयों का उल्लेख है।

कौशिक सूत्रानुसार अथर्ववेद के १४ वर्ण्य – विषय

१.यज्ञानुष्ठान एवं संस्कार २.पौष्टिक कर्म ३. अनिष्टनिवारण एवं शान्तिकर्म ४. समृद्धि ५. राजव्यवस्था, ६. अभ्युदय एवं अभीष्टसिद्धि ७. शिक्षा ८. सामनस्य- ऐक्य भाव ९. भैषज्य १०.आभिचारिक प्रयोग ११. स्त्रीकल्याण १२. गृह-सज्जा १३. प्रायश्चित्त विधान १४. भविष्य कथन। कालान्तर में इन वर्ण्य-विषयों की और विशद विवेचना प्रस्तुत की गई। उस आधार पर अथर्व के उक्त १४ विषय बढ़कर २९ हो गये, जो इस प्रकार हैं-

१. पाक यज्ञ २. मेधाजनन प्रयोग ३. ब्रह्मचर्यसिद्धि ४. ग्राम नगर संवर्द्धन ५. पुत्र-कलत्र, प्रजा-पशु आदि की समृद्धि ६. सामंजस्य-ऐक्यभाव ७. राजकर्म ८. शत्रुसादन ९. संग्राम विजय १०. शस्त्र परिहरण ११. सैन्य- स्तम्भन १२. सैन्य-परिरक्षण १३. जय-पराजय विचार १४. सेनापत्यादिक कर्म,१५. सैन्य भेदनीति, १६. राजा की पुनः स्थापना १७. प्रायश्चित्त कर्म १८. कृषि आदि संवर्द्धन १९. गृहस्थ अभ्युदय २०. भैषज्य कर्म २१. संस्कार २२. सभा-जय साधन २३. वृष्टि – प्रयोग २४. अभ्युदय कर्म २५. वाणिज्यकर्म २६. ऋण विमोचन २७. अभिचार निवारण २८. आयुष्य कर्म २९. यज्ञानुष्ठान।।

अथर्ववेद के ये प्रमुख प्रतिपाद्य विषय हैं। इनके भी कई अवान्तर भेद-उपभेद हो सकते हैं, जिनकी संख्या बहुत हो सकती है, इन्हें देखकर निष्कर्षतः यही कहा जा सकता है कि यह वेद जीवन को समग्रता से जीने, बाधाओं को निरस्त करने एवं सुख-शांतिमय प्रगतिशील जीवन के सूत्रों की कुञ्जियाँ, अपने आप में सँजोये हुए हैं।

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

संदर्भ ग्रन्थ : अथर्ववेद-संहिता परिचय वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा

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