अथर्ववेद संहिता – 1:1 – मेधाजनन सूक्त

अथर्ववेद-संहिता
॥अथ प्रथमं काण्डम्॥
[१- मेधाजनन सूक्त ]

[ऋषि – अथर्वा। देवता – वाचस्पति। छन्द – अनुष्टुप. ४ चतुष्पदा विराट् उरोबृहती।]

इस सूक्त के देवता वाचस्पति हैं। वाक् – शक्ति से अभिव्यक्ति होती है । परब्रह्म में तो अव्यक्तरूप में सभी कुछ समाहित रहता ही है; किन्तु जब वहअव्यक्त को अभिव्यक्त करता है, तो उसे वाचस्पति कहना युक्तिसंगत है। जिसने इस विश्व को व्यक्त-प्रकट किया, उसी से किसी विशिष्ट उपलब्धि के लिए प्रार्थना किया जाना उचित है-

१.ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः।
वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे॥१॥

ये जो त्रिसप्त (तीन एवं सात के संयोग) विश्व के सभी रूपों को धारण करके सब ओर संव्याप्त-गतिशील हैं, हे वाचस्पते! आप उनके शरीरस्थ बल को आज हमें प्रदान करे ॥१॥

[‘त्रिसप्त’ का अर्थ अधिकांश भाष्यकारों ने ३x७ = २१ किया है; किन्तु ऋषि का भाव इससे कहीं अधिक व्यापक प्रतीत होता है।

गणित के अनुसार त्रिसप्त की अभिव्यक्ति इतने प्रकार से हो सकती है-३ + ७ = १०, ३X७ = २१, ७^३ = ३४३, ३^७ = २१८७ तथा ३L७ = ३(७x६x५x४x3x२x१) = १५१२० आदि।

फिर ऋषि ने त्रिसप्त को एक ही शब्द के रूप में लिखा है, इसलिए उसका भाव यह बनता है कि जितने भी त्रिसप्त हैं……।

इस आधार पर ‘त्रिधा’ सृष्टि में तीन लोक, तीन गुण, तीन आयाम, त्रिदेव आदि सभी आते हैं। इसके साथ सप्त आवरण, सप्तधातु, सप्त व्याहतियाँ, परमाणु के सात प्रकोष्ठ (आर्बिट) आदि आ जाते है। इनमें से सभी के योग-भेद (पर्मुटेशन कॉम्बीनेशन) अनन्त बन जाते हैं। उन्हें केवल प्रकटकर्ता वाचस्पति ही भली प्रकार जानते हैं।

हमें विश्व में रहते हुए इन सभी के साथ समुचित बर्ताव करना होगा, इसलिए वाचस्पति से प्रार्थना की गई है कि उन सबके व्यक्त स्थूल-सूक्ष्म संयोगों के बल हमें भी प्रदान करें।

२. पुनरेहि वाचस्पते देवेन मनसा सह।
वसोष्पते नि रमय मय्येवास्तु मयि श्रुतम् ॥२॥

हे वाचस्पते ! आप दिव्य(प्रकाशित) ज्ञान से युक्त होकर, बारम्बार हमारे सम्मुख आएँ। हे वसोष्पते! आपहमें प्रफुल्लित करें। प्राप्त ज्ञान हममें स्थिर रहे ॥२॥

[यहाँ वाचस्पति (अभिव्यक्त करने वाले) से प्राप्ति की तथा वसोष्पते (आवास प्रदान करने वाले) से प्राप्त को धारण-स्थिर करने की प्रार्थना की गई है। योग एवं क्षेम दोनों ही सधे- ऐसी प्रार्थना है।]

३. इहैवाभि वि तनूभे आर्नी इव ज्यया।
वाचस्पतिर्नि यच्छतु मय्येवास्तु मयि श्रुतम्॥३॥

हे देव ! धनुष की चढ़ी हुई प्रत्यञ्चा से खिंचे हुए दोनों छोरों के समान दैवी ज्ञान धारण करने में समर्थ, मेधा बुद्धि एवं वांछित साधन-सामग्री आप हमें प्रदान करें। प्राप्त बुद्धि और वैभव हममें पूरी तरह स्थिर रहें ॥३॥

[ ज्ञान की प्राप्ति और धारण करने की सामर्थ्य- यह दो क्षमताएँ धनुष के दो सिरों की तरह हैं। एक साथ प्रयासपूर्वक बल लगाकर बाण की तरह, ज्ञान का वांछित प्रयोग किया जा सकता है।]

४. उपहूतो वाचस्पतिरुपास्मान् वाचस्पतिर्ह्ययताम्।
सं श्रुतेन गमेमहि मा श्रुतेन वि राधिषि ॥४॥

हे वाक्पते! आप हमें अपने पास बुलाएँ। इस निमित्त हम आपका आवाहन करते हैं। हमें सदैव आपका सानिध्य प्राप्त हो । हम कभी भी ज्ञान से विमुख न हों ॥४॥

[दिव्य ज्ञान की प्राप्ति केवल अपने पुरुषार्थ से नहीं हो पाती। अपने पुरुषार्थ से हम आवेदन करते हैं, पात्रता प्रकट करते हैं, तो दिव्य सत्ता द्वारा दिव्य ज्ञान प्रदान कर दिया जाता है।]

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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