अथर्ववेद-संहिता – 1:3 – मूत्र मोचन सूक्त

अथर्ववेद-संहिता
॥अथ प्रथमं काण्डम्॥
[३- मूत्र मोचन सूक्त]

[ऋषि- अथर्वा । देवता-१ पर्जन्य, २ मित्र, ३ वरुण,४ चन्द्र.५ सूर्य । छन्द – अनुष्टप, १-५ पथ्यापंक्ति।

इस सूक्त में पर्जन्य के अतिरिक्त मित्र, वरुण, चन्द्र एवं सूर्य को भी ‘शर’ का पिता कहा गया है। पूर्व सूक्तों में किये गये विवेचन के अनुसार पर्जन्य (उत्पादक सूक्ष्म प्रवाह) इन सभी के माध्यम से बरसता है। पूर्व मंत्रों में कहे गये ‘शर’ के पिता का व्यापक रूप मंत्र १ से ५ तक प्रकट किया गया प्रतीत होता है। इन सभी को शतवृष्ण-सैकड़ों (अनन्त) प्रकार से बरसने वाला अथवा अनन्त बल सम्पन्न कहा गया है-

९. विद्या शरस्य पितरं पर्जन्यं शतवृष्ण्यम्।
तेना ते तन्वे३ शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति ॥१॥

(ऋषि कहते हैं) इस शरीर के जनक शतवृष्ण पर्जन्य से हम भली-भाँति परिचित है। उससे तुम्हारे (शर की) कल्याण की कामना है। उनसे तुम्हारा विशेष सेचन हो और शत्रु (विकार) बाहर निकल जाएँ ॥१॥

१०. विद्या शरस्य पितरं मित्रं शतवृष्ण्यम्।
तेना ते तन्वे३ शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति॥२॥

अनन्त बलशाली मित्रदेव (प्राण वायु) को, जो ‘शर’ का पिता है, हम जानते हैं । उससे तुम्हारे कल्याण का उपक्रम शमन करते हैं। उससे तुम्हारा सेचन हो और विकार बाहर निकल जाएँ ॥२॥

११. विद्या शरस्य पितरं वरुणं शतवृष्ण्यम्।
तेना ते तन्वे३ शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति॥३॥

‘शर’ के पालक सशक्त वरुणदेव को हम जानते हैं । उससे तुम्हारे शरीर का कल्याण हो। तुम्हें विशेष पोषण प्राप्त हो तथा विकार बाहर निकल जाएँ॥३॥

१२. विद्या शरस्य पितरं चन्द्रं शतवृष्ण्यम्।
तेना ते तन्वे३ शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति॥४॥

हम शर के पिता आह्लादक चन्द्रदेव को जानते हैं, उनसे तुम्हारा कल्याण हो, विशेष पोषण प्राप्त हो और दोष बाहर निकल जाएँ ॥४॥

१३. विद्या शरस्य पितरं सूर्यं शतवृष्ण्यम्।
तेना ते तन्वे३ शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति॥५॥

हम जानते हैं कि विशेष शक्ति-सम्पन्न पवित्रतादायक सूर्य ‘शर’ के पालक हैं, वे तुम्हारा कल्याण करें । उनसे तुम्हें विशिष्ट पोषण प्राप्त हो तथा विकार बाहर निकल जाएँ ॥५॥

मंत्र क्र०६ से ९ में विशिष्ट उपचार द्वारा शरीरस्थ मूत्र-विकारों को बाहर निकालने का कथन है । स्थूल दृष्टि से ‘शर’ शलाका प्रयोग से मूत्र निकालने की प्रक्रिया पुराने समय से अब तक के उपचार क्रम में मान्य है; किन्तु शर को व्यापक अर्थों में लेने से जीवनी शक्ति के जनक दिव्य प्रवाहों के विशिष्ट प्रयोग से शरीरस्थ विकारों को बलात् बाहर निकाल देने का आशय भी प्रकट होता है। शरीरस्थ जीवनी-शक्ति (बाइटल फोर्स) ही पोषण देने तथा विकारों से मुक्ति दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाती है। इस मत को सभी उपचार पद्धतियाँ स्वीकार करती हैं।

१४. यदान्त्रेषु गवीन्योर्यद्वस्तावधि संश्रुतम्।
एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्॥६॥

मूत्र वाहिनी नाड़ियों,मूत्राशय एवं आँतों में स्थित दूषित जल (मूत्र) इस चिकित्सा से पूरा का पूरा, वेग के साथ शब्द करता हुआ शरीर से बाहर हो जाए ॥६॥

१५. प्र ते भिनद्मि मेहनं वत्रँ वेशन्त्या इव।
एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्॥७॥

‘शर’ (शलाका) से मूत्र मार्ग को खोल देते हैं। बन्ध टूट जाने से जिस प्रकार जलाशय का जल शीघ्रता से बाहर निकलता है, उसी प्रकार रोगी के उदरस्थ समस्त विकार वेगपूर्वक बाहर निकले॥७॥

१६. विषितं ते वस्तिबिलं समुद्रस्योदधेरिव।
एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्॥८॥

तेरे मूत्राशय का बिल (छिद्र) खोलते हैं । विकार युक्त जल (मूत्र) उसी प्रकार शब्द करता हुआ बाहर निकले, जिस प्रकार नदियों का जल उदधि में सहज ही बह जाता है ॥८॥

१७. यथेषुका परापतदवसृष्टाधि धन्वनः।
एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्॥९॥

धनुष से छोड़े गए, तीव्र गति से बढ़ते हुए बाण की भाँति तेरा सम्पूर्ण मूत्र (विकार) वेगपूर्वक बाहर निकले ॥९॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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