अथर्ववेद-संहिता – 1:4 – अपांभेषज (जल चिकित्सा) सूक्त

अथर्ववेद-संहिता
॥अथ प्रथमं काण्डम्॥
[४- अपांभेषज (जल चिकित्सा) सूक्त]

[ ऋषि -सिन्धुद्वीप। देवता – अपानपात्, सोम और आप: देवता। छन्द – गायत्री, ४ पुरस्ताद् बृहती।]

इस सूक्त के देवता आपः हैं। आप: का सामान्य अर्थ जल लिया जाता है; किन्तु शोध समीक्षा के आधार पर केवल जल ही मानने से अनेक मंत्रार्थ सिद्ध नहीं होते। जैसे-आपः को मन के समान गतिमान् कहा है, जल तो शब्द और प्रकाश की गति से भी नहीं बह सकता है। ‘आपो वै सर्वा देवता’ जैसे सूत्रों से भी यही भाव प्रकट होता है। मनुस्मृति १.८ के अनुसार ईश्वर ने अप् तत्त्व को सर्वप्रथम रचा। आप: यदि जल है, तो उसके पूर्व वायु और अग्नि की उत्पत्ति आवश्यक है, अन्यथा जल की संरचना सम्भव नहीं। अस्तु, आप: का अर्थ जल भी है किन्तु उसे विद्वानों ने सृष्टि के मूलतत्त्व की क्रियाशील अवस्था माना है। अखण्ड ब्रह्म के संकल्प से मूलतत्त्व का क्रियाशील स्वरूप पहले प्रकट होता है, उससे ही पदार्थ रचना प्रारम्भ होती है। ऐसे किसी तत्त्व के सतत प्रवाहित होने की परिकल्पना (हाइपोथेसिस) पदार्थ विज्ञानी भी करते हैं। मंत्रार्थों के क्रम में आपः के इस स्वरूप को ध्यान में रखना उचित है-

१८. अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम्। पृञ्चतीर्मधुना पयः॥१॥

माताओं-बहिनों की भाँति यज्ञ से उत्पन्न पोषक धाराएँ यज्ञ कर्ताओं के लिए पय (दूध या पानी) के साथ मधुर रस मिलाती हैं॥१॥

१९. अमूर्या उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह। ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्॥२॥

सूर्य के सम्पर्क में आकर पवित्र हुआ वाष्पीकृत जल, उसकी शक्ति के साथ पर्जन्य-वर्षा के रूप में हमारे सत्कर्मा को बढ़ाए-यज्ञ को सफल बनाए ॥२॥

२०. अपो देवीरुप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः। सिन्धुभ्य: कत्वँ हविः ॥३॥

हम उस दिव्य ‘आप:’ प्रवाह की अभ्यर्थना करते हैं, जो सिन्धु (अन्तरिक्ष) के लिए हवि प्रदान करते हैं तथा जहाँ हमारी गौएँ (इन्द्रियाँ अथवा वाणियाँ ) तृप्त होती है ॥३॥

२१. अप्स्व१न्तरमृतमप्सु भेषजम्।
अपामुत प्रशस्तिभिरश्वा भवथ वाजिनो गावो भवथ वाजिनीः ॥४॥

जीवनी शक्ति, रोगनाशक एवं पुष्टिकारक आदि दैवी गुणों से युक्त ‘आप:’ तत्त्व हमारे अश्वों व गौओं को वेग एवं बल प्रदान करे। हम बल-वैभव से सम्पन्न हों ॥४॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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