अथर्ववेद-संहिता – 1:5 – अपांभेषज (जल चिकित्सा) सूक्त

अथर्ववेद-संहिता
॥अथ प्रथमं काण्डम्॥
[५- अपांभेषज (जल चिकित्सा) सूक्त]

[ ऋषि – सिन्धुद्वीप । देवता – अपांनपात्, सोम और आपः देवता । छन्द – गायत्री, ४ वर्धमान गायत्री।]

२२. आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन । महे रणाय चक्षसे ॥१॥

हे आप: ! आप प्राणिमात्र को सुख देने वाले हैं । सुखोपभोग एवं संसार में रमण करते हुए, हमें उत्तम दृष्टि की प्राप्ति हेतु पुष्ट करें ॥१॥

२३. यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः॥२॥

जिनका स्नेह उमड़ता ही रहता है, ऐसी माताओं की भाँति आप हमें अपने सबसे अधिक कल्याणप्रद रस में भागीदार बनाएँ॥२॥

[दुर्गति का मुख्य कारण यह है कि हमारी रसानुभूति अहितकारी प्रवृत्तियों की ओर मुड़ जाती है, इसलिए जीवन का रस कल्याणोन्मुख रखने की प्रार्थना की गई है।]

२४. तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च नः॥३॥

अन्नादि उत्पन्न कर प्राणिमात्र को पोषण देने वाले हे दिव्य प्रवाह! हम आपका सान्निध्य पाना चाहते हैं। हमारी अधिकतम वृद्धि हो॥३॥

२५. ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम्। अपो याचामि भेषजम्॥४॥

व्याधि निवारक दिव्य गुण वाले जल का हम आवाहन करते हैं। वह हमें सुख-समृद्धि प्रदान करे । उस ओषधिरूप जल की हम प्रार्थना करते हैं ॥४॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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