अथर्ववेद-संहिता – 1:8 – यातुधाननाशन सूक्त

अथर्ववेद-संहिता
॥अथ प्रथमं काण्डम्॥

[८ – यातुधाननाशन सूक्त]

[ऋषि – चातन। देवता – बृहस्पति, अग्नीषोम, ३-४ अग्नि। छन्द-अनुष्टुप, ४ बार्हतगर्भा त्रिष्टुप्।]

३७. इदं हविर्यातुधानान् नदी फेनमिवा वहत्।
य इदं स्त्री पुमानकरिह स स्तुवतां जनः ॥१॥

नदी जिस प्रकार झाग (गन्दगी) को बहा देती है, उसी प्रकार यह ‘हवि’ पापाचारियों को यहाँ से दूर बहा ले जाए। दुष्कर्मों में निरत स्त्री-पुरुष अपनी रक्षा के लिए तुम्हारी स्तुति करें ॥१॥

३८. अयं स्तुवान आगमदिमं स्म प्रति हर्यत।
बृहस्पते वशे लब्ध्वाग्नीषोमा वि विध्यतम्॥२॥

प्रायश्चित्त की भावना से शरण में आए दुष्टों का स्वागत करें। हे मार्गदर्शक, ज्ञान के पुंज ! आप अपने सद्गुणों से उसे वश में करें। अग्नि और सोम (उपचार के लिए) उनका विशेष परीक्षण करें ॥२॥

३९. यातुधानस्य सोमप जहि प्रजां नयस्व च।
नि स्तुवानस्य पातय परमक्ष्युतावरम्॥३॥

ज्ञानामृत का पान कराने वाले हे सोम ! आसुरी वृत्तियों का समूल नाश हो, इसके लिए उसकी सन्तानों तक पहुँचकर आप उन्हें भी सन्मार्गगामी बनाएँ। स्तुति करने वाले के नेत्रों को नीचा (शालीनता से युक्त) कर दें ॥३॥

४०. यत्रैषामग्ने जनिमानि वेत्थ गुहा सतामत्रिणां जातवेदः।
तांस्त्वं ब्रह्मणा वावृधानो जह्येषां शततर्हमग्ने॥४॥

हे प्रकाशपुंज अग्ने ! आप पथभ्रष्ट जनों की सन्तानों तक सुदूर गुफा में पहुँच कर अपने दिव्य प्रकाश से उन्हें सन्मार्ग दिखाएँ, इस प्रकार आप सबके कष्टों को दूर करें ॥४॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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