अथर्ववेद-संहिता – 1:13 – विद्युत् सूक्त

अथर्ववेद-संहिता
॥अथ प्रथमं काण्डम्॥

[१३- विद्युत् सूक्त]

[ ऋषि -भृग्वङ्गिरा। देवता – विद्युत्। छन्द -अनुष्टुप्, ३ चतुष्पाद विराट् जगती, ४ त्रिष्टुप् परा बृहतीगर्भा पंक्ति।]

५९. नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे।नमस्ते अस्त्वश्मने येना दूडाशे अस्यसि॥१॥

विद्युत् को हमारा नमस्कार पहुँचे । गड़गड़ाहट करने वाले शब्द तथा अशनि को हमारा नमस्कार पहुँचे । व्यापने वाले मेघों को हमारा नमस्कार पहुँचे। हे देवि ! कष्ट पहुँचाने वाले दुष्टों पर वज्र फेंक कर आप उन्हें दूर हटाती हैं ॥१॥

६०. नमस्ते प्रवतो नपाद् यतस्तपः समूहसि। मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि॥२॥

हे देव (पर्जन्य) ! आप पानी को अपने अन्दर ग्रहण किये रहते हैं और असमय नीचे नहीं गिरने देते। हम आपको प्रणाम करते हैं; क्योंकि आप हमारे अन्दर तप एकत्रित करते हैं। आप हमारे देह को सुख प्रदान करें तथा हमारी सन्तानों को भी सुख प्रदान करें ॥२॥

६१. प्रवतो नपान्नम एवास्तु तुभ्यं नमस्ते हेतये तपुषे च कृण्मः।
विद्मे ते धाम परमं गुहा यत् समुद्रे अन्तर्निहितासि नाभिः॥३॥

ऊँचाई से न गिराने वाले हे पर्जन्य ! आपको हम प्रणाम करते हैं। आपके आयुध तथा तेजस् को हम प्रणाम करते हैं। आप जिस हृदयरूपी गुहा में निवास करते हैं, वह हमें ज्ञात है। आप उस समुद्र में नाभि के सदृश विद्यमान रहते हैं ॥३॥

६२. यां त्वा देवा असृजन्त विश्व इषुं कृण्वाना असनाय धृष्णुम्।
सा नो मृड विदथे गृणाना तस्यै ते नमो अस्तु देवि॥४॥

हे अशनि ! रिपुओं पर प्रहार करने के लिए समस्त देवताओं ने बलशाली बाण के रूप में आपकी संरचना की है। अन्तरिक्ष में गर्जना करने वाले हे अशनि ! हम आपको नमस्कार करते हैं। आप हमारे भय को दूर करके हमें हर्ष प्रदान करें ॥४॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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