अथर्ववेद-संहिता – 1:18 – अलक्ष्मीनाशन सूक्त

अथर्ववेद-संहिता
॥अथ प्रथमं काण्डम्॥

[१८- अलक्ष्मीनाशन सूक्त]

[ ऋषि – द्रविणोदा। देवता – विनायक। छन्द – १ उपरिष्टाद् विराट् बृहती, २ निवृत् जगती,३ विराट आस्तारपंक्ति त्रिष्टुप, ४ अनुष्टुप्।]

७९. निर्लक्ष्म्यं ललाम्यं१ निरराति सुवामसि।
अथ या भद्रा तानि नः प्रजाया अराति नयामसि॥१॥

ललाट पर स्थित बुरे लक्षणों को हम पूर्ण रूप से दूर करते हैं तथा जो हितकारक लक्षण हैं , उन्हें हम अपने लिए तथा अपनी सन्तानों के लिए प्राप्त करते हैं । इसके अलावा कृपणता आदि को दूर हटाते हैं॥१॥

८०. निररणि सविता साविषक् पदोर्निर्हस्तयोर्वरुणो मित्रो अर्यमा।
निरस्मभ्यमनुमती रराणा प्रेमां देवा असाविषुः सौभगाय॥२॥

मित्रावरुण, सविता तथा अर्यमा देव हमारे हाथों और पैरों के बुरे लक्षणों को दूर करें। सबकी प्रेरक अनुमति भी वांछित फल प्रदान करती हुई शरीर के बुरे लक्षणों को दूर करे। देवों ने भी इसी सौभाग्य को प्रदान करने के निमित्त प्रेरणा दी है॥२॥

८१. यत्त आत्मनि तन्वां घोरमस्ति यद्वा केशेषु प्रतिचक्षणे वा।
सर्वं तद् वाचाप हन्मो वयं देवस्त्वा सविता सूदयतु॥३॥

हे बरे लक्षणों से युक्त मनुष्यो! आपकी आत्मा, शरीर, बाल तथा आँखों में जो वीभत्सता का कुलक्षण है, उन सबको हम मन्त्रों का उच्चारण करके दूर करते हैं। सविता देवता आपको परिपक्व बनाएँ॥३॥

८२. रिश्यपदीं वृषदती गोषेधां विधमामुत।
विलीढ्यं ललाम्यं१ ता अस्मन्नाशयामसि॥४॥

ऐसी स्त्री जिसका पैर हिरण की तरह, दाँत बैल की तरह, चाल गाय की तरह तथा आवाज कठोर है, हम उसके मस्तक पर स्थित ऐसे सभी बुरे लक्षणों को मन्त्रों द्वारा दूर करते हैं॥४॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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