अथर्ववेद-संहिता – 1:21 – शत्रुनिवारण सूक्त

अथर्ववेद-संहिता
॥अथ प्रथमं काण्डम्॥

[२१- शत्रुनिवारण सूक्त]

[ऋषि – अथर्वा। देवता – इन्द्र। छन्द – अनुष्टुप्।]

९१. स्वस्तिदा विशां पतिर्वृत्रहा विमृधो वशी।वृषेन्द्रः पुर एतु नः सोमपा अभयङ्करः॥१॥

इन्द्रदेव सबका कल्याण करने वाले, प्रजाजनों का पालन करने वाले, वृत्र असुर का विनाश करने वाले, युद्धकर्ता शत्रुओं को वशीभूत करने वाले, साधकों की कामनाओं को पूर्ण करने वाले, सोमपान करने वाले और अभय प्रदान करने वाले हैं। वे हमारे समक्ष पधारें॥१॥

९२. वि न इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः।
अधर्म गमया तमो यो अस्माँ अभिदासति॥२॥

हे इन्द्रदेव ! आप हमारे शत्रुओं का विनाश करें। हमारी सेनाओं द्वारा पराजित शत्रुओं को मुँह लटकाये हुए भागने दें। हमें वश में करने के अभीच्छु शत्रुओं को गर्त में डालें॥२॥

*९३. वि रक्षो वि मृधो जहि वि वृत्रस्य हनू रुज। वि मन्युमिन्द्र वृत्रहन्नमित्रस्याभिदासतः॥३॥**

हे इन्द्रदेव ! आप राक्षसों का विनाश करें। हिंसक दृष्टों को नष्ट करें। वृत्रासुर का जबड़ा तोड़ दें। हे शत्रु-नाशक इन्द्रदेव! आप हमारे संहारक शत्रुओं के क्रोध एवं दर्प को नष्ट करें॥३॥

९४. अपेन्द्र द्विषतो मनोऽप जिज्यासतो वधम्। वि महच्छर्म यच्छ वरीयो यावया वधम्॥४॥

हे इन्द्रदेव! आप शत्रुओं के मनों का दमन करें। हमारा संहार करने के अभिलाषी शत्रुओं को नष्ट करें। शत्रुओं के क्रोध से हमारी रक्षा करते हुए हमें श्रेष्ठ सुख प्रदान करें। शत्रु से प्राप्त मृत्यु का निवारण करें ॥४॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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