अथर्ववेद-संहिता – 1:22 – हृद्रोगकामलानाशन सूक्त

अथर्ववेद-संहिता
॥अथ प्रथमं काण्डम्॥

[२२- हृद्रोगकामलानाशन सूक्त]

[ ऋषि – ब्रह्मा। देवता – सूर्य, हरिमा और हृद्रोग। छन्द- अनुष्टुप्।]

९५. अनु सूर्यमुदयतां हृद्द्योतो हरिमा च ते। गो रोहितस्य वर्णेन तेन त्वा परि दध्मसि॥१॥

हे रोगग्रस्त मनुष्य ! हृदय रोग के कारण आपके हृदय की जलन तथा (पीलिया या रक्ताल्पता का विकार) आपके शरीर का पीलापन, सूर्य की ओर चला जाए। रक्तवर्ण की गौओं अथवा सूर्य की रक्तवर्ण की रश्मियों के द्वारा हम आपको हर प्रकार से बलिष्ठ बनाते हैं ॥१॥

९६. परि त्वा रोहितैर्वर्णैर्दीर्घायुत्वाय दध्मसि।यथायमरपा असदथो अहरितो भुवत्॥२॥

हे व्याधिग्रस्त मनुष्य ! दीर्घायुष्य प्राप्त करने के लिए हम आपको लोहित वर्ण के द्वारा आवृत करते है, जिससे आप रोगरहित होकर पाण्डु रोग से विमुक्त हो सकें॥२॥

९७. या रोहिणीर्देवत्यार गावो या उत रोहिणीः।
रूपंरूपं वयोवयस्ताभिष्टवा परि दध्मसि॥३॥

देवताओं की जो रक्तवर्ण की गौएँ हैं अथवा रक्तवर्ण की रश्मियाँ हैं, उनके विभिन्न स्वरूपों और आयुष्यवर्द्धक गुणों से आपको आच्छादित (उपचारित) करते हैं॥३॥

९८. शुकेषु ते हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि।
अथो हारिद्रवेषु ते हरिमाणं नि दध्मसि॥४॥

हम अपने हरिमाण (पीलिया अथवा शरीर को क्षीण करने वाले रोग) को शुकों (तोतो) रोपणाका (वृक्षों) एवं हरिद्रवों (हरी वनस्पतियों) में स्थापित करते हैं ॥४॥

[मनुष्य के रोगाणु जब विशिष्ट पक्षियों या वनस्पतियों में प्रविष्ट होते हैं, तो उनमें उन रोगों के प्रतिरोधक तत्त्व(एन्टीबॉडीज) उत्पन्न होते हैं। उनके संसर्ग से मनुष्यों के रोगों का शमन होता है। मनुष्य के मल विकार-पक्षियों एवं वनस्पतियों के लिए स्वाभाविक आहार बन जाते हैं, इसलिए रोग विकारों को उनमें विस्थापित करना उचित है।]

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!