अथर्ववेद-संहिता – 1:24 – श्वेतकुष्ठ नाशन सूक्त

अथर्ववेद-संहिता
॥अथ प्रथमं काण्डम्॥

[२४- श्वेतकुष्ठ नाशन सूक्त]

[ ऋषि – ब्रह्मा। देवता – आसुरी वनस्पति। छन्द – अनुष्टुप, २ निचृत् पथ्या पंक्ति।]

१०३. सुपर्णों जातः प्रथमस्तस्य त्वं पित्तमासिथ।
तदासुरी युधा जिता रूपं चक्रे वनस्पतीन्॥१॥

हे ओषधे !सर्वप्रथम आप सुपर्ण (सूर्य या गरुड़) के पित्तरूप में थीं। आसुरी (शक्तिशाली) सुपर्ण के साथ संग्राम जीतकर उस पित्त को ओषधि का स्वरूप प्रदान किया। वही रूप नील आदि ओषधि में प्रविष्ट किया है॥१॥

१०४. आसुरी चक्रे प्रथमेदं किलासभेषजमिदं किलासनाशनम्।
अनीनशत् किलासं सरूपामकरत् त्वचम्॥२॥

उस आसुरी माया ने नील आदि ओषधि को कुष्ठ निवारक ओषधि के रूप में विनिर्मित किया था। यह ओषधि कुष्ठ नष्ट करने वाली है। प्रयोग किये जाने पर इसने कुष्ठ रोग को विनष्ट किया। इसने दूषित त्वचा को रोग शून्य त्वचा के समान रंग वाली कर दिया॥२॥

१०५. सरूपा नाम ते माता सरूपो नाम ते पिता।
सरूपकृत् त्वमोषधे सा सरूपमिदं कृधि॥३॥

हे ओषधे ! आपकी माता आपके समान वर्ण वाली है तथा आपके पिता भी आपके समान वर्ण वाले हैं और आप भी समान रूप करने वाली हो। इसलिए हे नील ओषधे! आप इस कुष्ठ रोग से दूषित रंग को अपने समान रंग-रूप वाला करें॥३॥

१०६. श्यामा सरूपङ्करणी पृथिव्या अध्युद्धृता।
इदमूषु प्रसाधय पुना रूपाणि कल्पय॥४॥

हे काले रंग वाली ओषधे ! आप समान रूप बनाने वाली हो। आसुरी माया ने आपको धरती के ऊपर पैदा किया है। आप इस कुष्ठ रोग ग्रस्त अंग को भली प्रकार रोगमुक्त करके पूर्ववत् रंग-रूप वाला बना दें॥४॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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