अथर्ववेद-संहिता – 1:29 – राष्ट्र अभिवर्धन, सपत्नक्षयण सूक्त

अथर्ववेद-संहिता
॥अथ प्रथमं काण्डम्॥

[२९- राष्ट्र अभिवर्धन, सपत्नक्षयण सूक्त]

[ ऋषि – वसिष्ठ। देवता – अभीवर्तमणि ब्रह्मणस्पति। छन्द – अनुष्टुप्।]

१२३. अभीवर्तेन मणिना येनेन्द्रो अभिवावृधे।
तेनास्मान् ब्रह्मणस्पतेऽभि राष्ट्राय वर्धय॥१॥

हे ब्रह्मणस्पते ! जिस समृद्धिदायक मणि से इन्द्रदेव की उन्नति हुई, उसी मणि से आप हमें राष्ट्र के लिए (राष्ट्रहित के लिए) विकसित करें॥१॥

१२४. अभिवृत्य सपत्नानभि या नो अरातयः।अभि पृतन्यन्तं तिष्ठाभि यो नो दुरस्यति॥२॥

हे राजन् ! हमारे विरोधी हिंसक शत्रु सेनाओं को, जो हमसे युद्ध करने के इच्छुक है, जो हमसे द्वेष करते हैं, आप उन्हें घेरकर पराभूत करें ॥२॥

१२५. अभि त्वा देवः सविताभि सोमो अवीवृधत्।
अभि त्वा विश्वा भूतान्यभीवतों यथाससि॥३॥

हे राजन् ! सवितादेव, सोमदेव और समस्त प्राणिसमुदाय आपको शासनाधिरूढ़ करने में सहयोग करें। इन सबकी अनुकूलता से आप भली- भाँति शासन करें॥३॥

१२६. अभीवों अभिभवः सपत्नक्षयणो मणिः।
राष्ट्राय मह्यं बध्यतां सपत्नेभ्यः पराभुवे॥४॥

यह मणि रिपुओं को आवृत करके उनको पराजित करने वाली है तथा विरोधियों का विनाश करने वाली है। विरोधियों को पराभूत करने के लिए तथा राष्ट्र की उन्नति के लिए इस मणि को हमारे शरीर में बाँधे ॥४॥

१२७. उदसौ सूर्यो अगादुदिदं मामकं वचः। यथाहं शत्रुहोऽसान्यसपत्नः सपत्नहा॥५॥

ये सूर्यदेव उदित हो गये, हमारी वाणी (मंत्र शक्ति) भी प्रकट हो गई है। (इनके प्रभाव से) हम शत्रुनाशक, दुष्टों पर आघात करने वाले तथा शत्रुहीन हों॥५॥

१२८. सपत्नक्षयणो वृषाभिराष्ट्रो विषासहिः।
यथाहमेषां वीराणां विराजानि जनस्य च॥६॥

हे मणे ! हम शत्रुहन्ता, बलवान् एवं विजयी होकर राष्ट्र के अनुकूल वीरों तथा प्रजाजनों के हित सिद्ध करने वाले बनें ॥६॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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