अथर्ववेद-संहिता – 1:30 – दीर्घायुप्राप्ति सूक्त

अथर्ववेद-संहिता
॥अथ प्रथमं काण्डम्॥

[३०-दीर्घायुप्राप्ति सूक्त]

[ ऋषि – अथर्वा। देवता – विश्वेदेवा। छन्द – त्रिष्टुप् , ३ शाक्वरगर्भा विराट् जगती।]

१२९. विश्वे देवा वसवो रक्षतेममुतादित्या जागृत यूयमस्मिन्।
मेमं सनाभिरुत वान्यनाभिर्मेमं प्रापत् पौरुषेयो वधो यः॥१॥

हे समस्त देवताओ! हे वसुओ ! इस आयुष्य की अभिलाषा करने वाले मनुष्य की आप सब सुरक्षा करें। हे आदित्यो ! आप सब भी इस सम्बन्ध में सावधान रहें। इसका विनाश करने के लिए इसके बन्धु अथवा दूसरे शत्रु इस व्यक्ति के समीप न आ सकें। इसको मारने में कोई भी सक्षम न हो सकें ॥१॥

१३०. ये वो देवाः पितरो ये च पुत्राः सचेतसो मे शृणुतेदमुक्तम्।
सर्वेभ्यो वः परि ददाम्येतं स्वस्त्ये नं जरसे वहाथ॥२॥

हे देवताओ! आपके जो पिता तथा पुत्र हैं, वे सब आयु की कामना करने वाले व्यक्ति के विषय में मेरी इस प्रार्थना को सावधान होकर सुनें। हम इस व्यक्ति को आपके लिए समर्पित करते हैं। आप इसकी संकटों से सुरक्षा करते हुए इसे पूर्ण आयु तक हर्षपूर्वक पहुँचाएँ॥२॥

१३१. ये देवा दिविष्ठ ये पृथिव्यां ये अन्तरिक्ष ओषधीषु पशुष्वप्स्व१न्तः।
ते कृणुत जरसमायुरस्मै शतमन्यान् परि वृणक्तु मृत्यून्॥३॥

हे समस्त देवो ! आप जगत् के कल्याण के निमित्त धुलोक में निवास करते हैं। हे अग्नि आदि देवो! आप पृथ्वी पर निवास करते हैं। हे वायुदेव ! आप अन्तरिक्ष में निवास करते हैं। हे ओषधियों तथा गौओं में विद्यमान देवताओ! आप इस आयुष्यकामी व्यक्ति को लम्बी आयु प्रदान करें। आपकी सहायता से यह व्यक्ति मृत्यु के कारणरूप सैकड़ो ज्वरादि रोगों से सुरक्षित रहे॥३॥

१३२. येषां प्रयाजा उत वानुयाजा हुतभागा अहुतादश्च देवाः।
येषां वः पञ्च प्रदिशो विभक्तास्तान् वो अस्मै सत्रसदः कृणोमि॥४॥

जिन अग्निदेव के लिए पाँच याग किए जाते हैं और जिन इन्द्र आदि देव के लिए तीन याग किए जाते हैं और अग्नि में होमी हुई आहुतियाँ जिनका भाग है, अग्नि से बाहर डाली हुई आहुतियों का सेवन करने वाले बलिहरण आदि देव तथा पाँच दिशाएँ जिनके नियन्त्रण में रहती हैं। उन समस्तं देवों को हम आयुष्यकामी व्यक्ति की आयुर्वृद्धि के लिए उत्तरदायी बनाते हैं ॥४॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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