February 24, 2021

अथर्ववेद संहिता – 2:20 – शत्रुनाशन सूक्त

अथर्ववेद संहिता
द्वितीय काण्ड
[२०- शत्रुनाशन सूक्त]

[ ऋषि -अथर्वा। देवता – वायु। छन्द -एकावसाना निचृत् विषमा त्रिपदागायत्री, ५ भुरिक विषमा त्रिपदागायत्री]

२६३. वायो यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥१॥

हे वायुदेव ! आपके अन्दर जो ताप (प्रताप) है, उस शक्ति के द्वारा आप उन रिपुओं को तप्त करें, जो हमसे विद्वेष करते हैं तथा जिनसे हम विद्वेष करते हैं॥१॥

२६४. वायो यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥२॥

हे वायुदेव ! आपके अन्दर जो हरने की शक्ति है, उस शक्ति के द्वारा आप उन रिपुओं की शक्ति का हरण करें, जो हमसे शत्रुता करते हैं तथा जिनसे हम शत्रुता करते हैं ॥२॥

२६५. वायो यत् तेऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥३॥

हे वायुदेव! आपके अन्दर जो प्रज्वलन शक्ति है, उस शक्ति के द्वारा आप उन रिपुओं को जला दें,जो हमसे शत्रुता करते हैं तथा जिनसे हम शत्रुता करते हैं॥३॥

२६६. वायो यत् ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥४॥

हे वायुदेव ! आपके अन्दर जो शोकाकुल करने की शक्ति है, उस शक्ति के द्वारा आप उन मनुष्यों को शोकाभिभूत करें, जो हमसे विद्वेष करते हैं तथा जिनसे हम विद्वेष करते हैं॥४॥

२६७. वायो यत् ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥५॥

हे वायुदेव ! आपके अन्दर जो पराभिभूत करने की शक्ति विद्यमान है, उस शक्ति के द्वारा आप उन रिपुओं को तेजहीन करें,जो हमसे विद्वेष करते हैं तथा जिनसे हम विद्वेष करते हैं ॥५॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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