अथर्ववेद संहिता – 2:27 – शत्रुपराजय सूक्त

अथर्ववेद संहिता
॥अथ द्वितीय काण्डम्॥
[२७- शत्रुपराजय सूक्त]

[ ऋषि – कपिञ्जल। देवता – १-५ ओषधि,६ रुद्र, ७ इन्द्र। छन्द – अनुष्टुप्।]

इस सूक्त में ओषधि को लक्ष्य किया गया है। चौथे मंत्र में उसे पाटा(पाठा) सम्बोधन भी दिया गया है। जिससे उस नाम वाली ओषधि विशेष का बोध होता है। मंत्रों में ‘प्राश-प्रति प्राशो’ शब्द प्रयुक्त हुआ है, अधिकांश आचार्यों ने इसका अर्थ प्रश्न-प्रति प्रश्न किया है, किन्तु ओषधि के संदर्भ में प्राश का अर्थ-ग्रहण करना तथा प्रतिप्राश का अर्थ-ग्रहण न करना भी होता है। इन दोनों ही संदर्भो में मंत्रार्थ सिद्ध होते हैं-

३०१. नेच्छत्रुः प्राशं जयाति सहमानाभिभूरसि।
प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे॥१॥

हे ओषधे! आपका सेवन करने वाले हम मनुष्यों को प्रतिवादी रिपु कभी विजित न कर सकें, क्योंकि आप रिपुओं से टक्कर लेकर उन्हें वशीभूत करने वाली हैं। आप हमारे द्वारा प्रश्न (प्राशन-ग्रहण) करने पर प्रतिपक्षियों (प्रतिप्राश-ग्रहण न करने वाले) को परास्त करें। हे ओषधे ! आप प्रतिवादियों के कण्ठ को शोषित करें अर्थात् उन्हें बोलने में असमर्थ करें॥१॥

३०२. सुपर्णस्त्वान्वविन्दत् सूकरस्त्वाखनन्नसा।
प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे॥२॥

हे ओषधे ! गरुड़ ने आपको विष नष्ट करने के लिए प्राप्त किया है तथा सूअर ने अपनी नाक के द्वारा आपको खोदा है। आप हमारे द्वारा प्रश्न (प्राशन-ग्रहण) करने पर प्रतिपक्षियों (प्रतिप्राश-ग्रहण न करने वाले) को परास्त करें। हे ओषधे ! आप प्रतिवादियों के कण्ठ को नीरस करके उन्हें बोलने में असमर्थ कर दें॥२॥

३०३. इन्द्रो ह चक्रे त्वा बाहावसुरेभ्य स्तरीतवे।
प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे॥३॥

हे ओषधे ! राक्षसों से अपनी सुरक्षा करने के लिए इन्द्रदेव ने आपको अपनी बाहु पर धारण किया था। आप हमारे द्वारा प्रश्न (प्राशन-ग्रहण) करने पर प्रतिपक्षियों (प्रतिप्राश-ग्रहण न करने वाले) को परास्त करें। हे ओषधे ! आप प्रतिवादियों के कण्ठ को नीरस करके उन्हें बोलने में असमर्थ कर दें॥३॥

३०४. पाटामिन्द्रो व्याश्नादसुरेभ्य स्तरीतवे। प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे॥४॥

हे पाठा ओषधे ! राक्षसों से अपनी सुरक्षा करने के लिए इन्द्रदेव ने आपका सेवन किया था। आप हमारे द्वारा प्रश्न (प्राशन-ग्रहण) करने पर प्रतिपक्षियों (प्रतिप्राश-ग्रहण न करने वाले) को परास्त करें। हे ओषधे ! आप प्रतिवादियों के कण्ठ को नीरस करके उन्हें बोलने में असमर्थ कर दें॥४॥

३०५. तयाहं शत्रून्त्साक्ष इन्द्रः सालावृकाँ इव।प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे॥५॥

जिस प्रकार इन्द्रदेव ने जंगली कुत्तों को निरुत्तर कर दिया था, उसी प्रकार हे ओषधे ! आपका सेवन करके हम प्रतिवादी रिपुओं को निरुत्तर करते हैं। आप हमारे द्वारा प्रश्न (प्राशन-ग्रहण) करने पर प्रतिवादियों (प्रतिप्राश-ग्रहण न करने वाले) को परास्त करें। हे ओषधे ! आप प्रतिवादियों के कण्ठ को नीरस करके उन्हें बोलने में असमर्थ कर दें ॥५॥

३०६. रुद्र जलाषभेषज नीलशिखण्ड कर्मकृत्।प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे॥६॥

हे रुद्र ! आप जल द्वारा चिकित्सा करने वाले तथा नील वर्ण की शिखा वाले हैं। आप सृष्टि आदि (सृष्टि, स्थिति, संहार, प्रलय तथा अनुग्रह) पंच कृत्यों को सम्पन्न करने वाले हैं। आप हमारे द्वारा सेवन की जाने वाली इस ओषधि को, प्रतिपक्षियों को परास्त करने में समर्थ करें। हे ओषधे ! आप हमारे द्वारा प्रश्न (प्राशन-ग्रहण) करने पर प्रतिवादियों (प्रतिप्राश-ग्रहण न करने वाले) को परास्त करें तथा उनके कण्ठ को नीरस करके उन्हें बोलने में असमर्थ करें॥६॥

३०७. तस्य प्राशं त्वं जहि यो न इन्द्राभिदासति।
अधि नो ब्रूहि शक्तिभिः प्राशि मामत्तरं कृधि॥७॥

हे इन्द्रदेव जो प्रतिवादी अपनी युक्तियों के द्वारा हमें कमजोर करना चाहते हैं, उनके प्रश्नों को आप निरस्त करे और अपनी सामर्थ्य के द्वारा हमें सर्वश्रेष्ठ बनाएँ ॥७॥

– भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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