अथर्ववेद संहिता – 2:3 – आस्त्रावभेषज सूक्त

अथर्ववेद संहिता
द्वितीय काण्ड

[३- आस्त्रावभेषज सूक्त]

[ ऋषि – अङ्गिरा। देवता – भैषज्य, आयु, धन्वन्तरि। छन्द -अनुष्टुप. ६ त्रिपात् स्वराट् उपरिष्टात् महाबृहती।

१६४. अदो यदवधावत्यवत्कमधि पर्वतात्।
तत्ते कृणोमि भेषजं सुभेषजं यथाससि॥१॥

जो रक्षक-प्रवाह (सोम) मुञ्जवान् पर्वत के ऊपर से नीचे लाया जाता है, उसके अग्रभाग वनस्पति को हम इस प्रकार बनाते हैं, जिससे वह आपके लिए श्रेष्ठ औषधि बन जाए॥१॥

*×१६५. आदङ्गा कुविदङ्गा शतं या भेषजानि ते।**
तेषामसि त्वमुत्तममनास्त्रावमरोगणम्॥२॥
हे दिव्य प्रवाह ! जो आपसे उत्पन्न होने वाली असीम ओषधियाँ हैं, वे अतिसार, बहुमूत्र तथा नाड़ीव्रण आदि रोगों को विनष्ट करने में पूर्णरूप से सक्षम हैं॥२॥

१६६. नीचैः खनन्त्यसुरा अरुस्राणमिदं महत्।
तदात्रावस्य भेषजं तदु रोगमनीनशत्॥३॥

प्राणों का विनाश करने वाले तथा देह को गिराने वाले असुर रूप रोग, व्रण के मुख को अन्दर से फाड़ते हैं; लेकिन वह मूँज नामक ओषधि घाव की अत्युत्तम ओषधि है। वह अनेकों व्याधियों को नष्ट कर देती है॥३॥

१६७. उपजीका उद्भरन्ति समुद्रादधि भेषजम्।
तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमशीशमत्॥४॥

धरती के नीचे विद्यमान जलराशि से व्याधि नष्ट करने वाली ओषधि रूप बमई (दीमक की बाँबी) की मिट्टी ऊपर आती है, यह मिट्टी आस्राव की ओषधि है। यह अतिसार आदि व्याधियों को शमित (शान्त) करती है॥४॥

१६८. अरुस्राणमिदं महत् पृथिव्या अध्युद्भुतम्।
तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमनीनशत्॥५॥

खेत से उठाई हुई ओषधि रूप मिट्टी फोड़े को पकाने वाली तथा अतिसार आदि रोगों को समूल नष्ट करने वाली (रामबाण) ओषधि है॥५॥

१६९. शं नो भवन्त्वप ओषधयः शिवाः।
इन्द्रस्य वज्रो अप हन्तु रक्षस आराद् विसृष्टा इषवः पतन्तु रक्षसाम्॥६॥

ओषधि के लिए प्रयोग किया हुआ जल हर्ष प्रदायक होकर हमारी व्याधियों को शमित करने वाला हो। रोग को उत्पन्न करने वाले (असुरों) को इन्द्रदेव का वज्र विनष्ट करे। असुरों द्वारा मनुष्यों पर संधान किये गये व्याधिरूप बाण हम सबसे दूर जाकर गिरें॥६॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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