अथर्ववेद-संहिता – 2:1 – परमधाम सूक्त

अथर्ववेद-संहिता
॥अथ द्वितीय काण्डम्॥

[१- परमधाम सूक्त]

[ ऋषि – वेन। देवता – ब्रह्मात्मा। छन्द – त्रिष्टुप, ३ जगती।]

इस सूक्त के ऋषि वेन (स्वयं प्रकाशवान्- आत्मप्रकाशयुक्त साधक) हैं। वे ही ऋतरूप ब्रह्म या परमात्म तत्व को जान पाते हैं। प्रथम मंत्र में उस ब्रह्म का स्वरूप तथा दूसरे में उसे जानने का महत्व समझाया गया है। तीसरे में जिज्ञासा, चौथे में बोध तथा पाँचवे में तद्रूपता का वर्णन है-

१५४. वेनस्तत् पश्यत् परमं गुहा यद् यत्र विश्वं भवत्येकरूपम्।
इदं पृश्निरदुहज्जायमानाः स्वर्विदो अभ्यनूषत वाः॥१॥

गुहा (अनुभूति या अन्त:करण) में जो सत्य, ज्ञान आदि लक्षण वाला ब्रह्म है, जिसमें समस्त जगत् विलीन हो जाता है, उस श्रेष्ठ परमात्मा को वेन (प्रकाशवान्-ज्ञानवान् या सूर्य) ने देखा। उसी ब्रह्म का दोहन करके प्रकृति ने नाम-रूप वाले भौतिक जगत् को उत्पन्न किया। आत्मज्ञानी मनुष्य उस परब्रह्म की स्तुति करते हैं॥१॥

१५५. प्र तद् वोचेदमृतस्य विद्वान् गन्धर्वो धाम परमं गहा यत्।
त्रीणि पदानि निहिता गुहास्य यस्तानि वेद स पितुष्पितासत्॥२॥

गन्धर्व (वाणी या किरणों से युक्त विद्वान् या सूर्य) के बारे में उपदेश दें। इस ब्रह्म के तीन पद हृदय की गुफा में विद्यमान हैं। जो मनुष्य उसे ज्ञात कर लेता है, वह पिता का भी पिता (सर्वज्ञ सबके उत्पत्तिकर्ता ब्रह्म का भी ज्ञाता) हो जाता है॥२॥

१५६. स नः पिता जनिता स उत बन्धुर्धामानि वेद भुवनानि विश्वा।
यो देवानां नामध एक एव तं संप्रश्नं भुवना यन्ति सर्वा॥३॥

वह ब्रह्म हमारा पिता, जन्मदाता तथा भाई है, वही समस्त लोकों तथा स्थानों को जानने वाला है। वह अकेला ही समस्त देवताओं के नामों को धारण करने वाला है। समस्त लोक उसी ब्रह्म के विषय में प्रश्न पूछने के लिए (ज्ञाता के पास) पहुँचते हैं॥३॥

१५७. परि द्यावापृथिवी सद्य आयमुपातिष्ठे प्रथमजामृतस्य।
वाचमिव वक्तरि भुवनेष्ठा धास्युरेष नन्वे३ षो अग्निः॥४॥

(ब्रह्मज्ञानी का कथन) मैं शीघ्र ही द्यावा-पृथिवी को (तत्त्व दृष्टि से) जान गया हूँ,(अस्तु) ऋत(परमसत्य) की उपासना करता हूँ। जिस प्रकार वक्ता के अन्दर वाणी विद्यमान रहती है, उसी प्रकार वह ब्रह्म समस्त लोकों में विद्यमान रहता है और वही समस्त प्राणियों को धारण तथा पोषण करने वाला है। निश्चित रूप से अग्नि भी वही है॥४॥

१५८. परि विश्वा भुवनान्यायमृतस्य तन्तुं विततं दृशे कम्।
यत्र देवा अमृतमानशाना: समाने योनावध्यैरयन्त॥५॥

जहाँ अमृत सेवन करने वाले, समान आधार वाले देवगण (या अमृत – आनन्दसेवी देवपुरुष) विचरण करते हैं, उस ऋत (परमसत्य) के ताने-बाने को मैंने अनेक बार देखा है॥५॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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