अथर्ववेद – Atharvaveda – 2:17 – बलप्राप्ति सूक्त

अथर्ववेद संहिता
द्वितीय काण्ड
[१७- बलप्राप्ति सूक्त]

[ ऋषि – ब्रह्मा। देवता – प्राण, अपान, आयु। छन्द – एकपदासुरी त्रिष्टुप्. ७ आसुरी उष्णिक्।]

२४६. ओजोऽस्योजो मे दाः स्वाहा॥१॥

हे अग्निदेव! आप ओजस्वी हैं। अत: हमें ओज प्रदान करें; हम आपको आहुति प्रदान करते हैं॥१॥

२४७. सहोऽसि सहो मे दाः स्वाहा॥२॥

हे अग्निदेव ! आप शौर्यवान् है, इसलिए हमें शौर्य प्रदान करे. हम आपको हवि प्रदान करते हैं॥२॥

२४८. बलमसि बलं मे दाः स्वाहा॥३॥

हे अग्निदेव ! आप बल से सम्पन्न है, अत: हमें बल प्रदान करें, हम आपको हवि प्रदान करते हैं॥३॥

२४९. आयुरस्यायुर्मे दाः स्वाहा॥४॥

हे अग्ने !आप जीवनशक्ति-संपन्न हैं।अत:हमें वह शक्ति प्रदान करें, हम आपको हवि प्रदान करते हैं ॥४॥

२५०. श्रोत्रमसि श्रोत्रं मे दाः स्वाहा॥५॥

हे अग्ने !आप श्रवणशक्तिसम्पन्न हैं। अत: हमें वह शक्ति प्रदान करें; हम आपको हवि प्रदान करते हैं॥५॥

२५१. चक्षुरसि चक्षुर्मे दाः स्वाहा॥६॥

हे अग्ने !आप दर्शनशक्ति-सम्पन्न है ।अत: हमें वह शक्ति प्रदान करें, हम आपको हवि प्रदान करते हैं॥६॥

२५२. परिपाणमसि परिपाणं मे दाः स्वाहा॥७॥

हे अग्निदेव ! आप परिपालन की शक्ति से सम्पन्न हैं। अत: आप हमें पालन करने की शक्ति प्रदान करें, हम आपको हवि प्रदान करते हैं ॥७॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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