अथर्ववेद – Atharvaveda – 2:18 – शत्रुनाशन सूक्त

अथर्ववेद संहिता
द्वितीय काण्ड
[१८- शत्रुनाशन सूक्त]

[ ऋषि – चातन। देवता – अग्नि। छन्द – द्विपदा साम्नी बृहती।]

२५३. भ्रातृव्यक्षयणमसि भ्रातृव्यचातनं मे दाः स्वाहा॥१॥

हे अग्निदेव ! आप रिपु विनाशक शक्ति से सम्पन्न हैं। अत: आप हमें रिपु नाशक शक्ति प्रदान करें, हम आपको आहुति प्रदान करते हैं॥१॥

२५४. सपत्नक्षयणमसि सपत्नचातनं मे दाः स्वाहा॥२॥

हे अग्निदेव ! आप प्रत्यक्ष प्रतिद्वंद्वियों को विनष्ट करने वाली शक्ति से सम्पन्न हैं। अत: आप हमें वह शक्ति प्रदान करें, हम आपको हवि प्रदान करते हैं॥२॥

२५५. अरायक्षयणमस्यरायचातनं मे दाः स्वाहा॥३॥

हे अग्निदेव! आप निर्धनता को विनष्ट करने वाले हैं। आप हमें दरिद्रता विनाशक शक्ति प्रदान करें; हम आपको हवि प्रदान करते हैं ॥३॥

२५६. पिशाचक्षयणमसि पिशाचचातनं मे दाः स्वाहा॥४॥

हे अग्निदेव ! आप पिशाचों को विनष्ट करने वाले है। अत: आप हमें पिशाचनाशक शक्ति प्रदान करें; हम आपको हवि प्रदान करते हैं॥४॥

२५७. सदान्वाक्षयणमसि सदान्वाचातनं मे दाः स्वाहा॥५॥

हे अग्निदेव ! आप आसुरी वृत्तियों को दूर करने की शक्ति से सम्पन्न हैं। अत: आप हमें वह शक्ति प्रदान करें; हम आपको हवि प्रदान करते हैं ।।५।।

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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