अथर्ववेद – Atharvaveda – 2:31 – कृमिजम्भन सूक्त

अथर्ववेद संहिता
॥अथ द्वितीय काण्डम्॥
[३१- कृमिजम्भन सूक्त]

[ ऋषि – काण्व। देवता – मही अथवा चन्द्रमा। छन्द – १ अनुष्टुप्, २,४ उपरिष्टात् विराट् बृहती, ३,५ आर्षी त्रिष्टुप्।]

३२५. इन्द्रस्य या मही दृषत् क्रिमेर्विश्वस्य तर्हणी।
तया पिनष्मि सं क्रिमीन् दृषदा खल्वाँ इव॥१॥

इन्द्रदेव की जो विशाल शिला है, वह समस्त कीटाणुओं को विनष्ट करने वाली है। उसके द्वारा हम कीटाणओं को उसी प्रकार पीसते हैं, जिस प्रकार पत्थर के द्वारा चना पीसा जाता है॥१॥

३२६. दृष्टमदृष्टमतृहमथो कुरूरुमतृहम्।
अल्गण्डून्त्सर्वाञ्छलुनान् क्रिमीन् वचसा जम्भयामसि॥२॥

आँखों से दिखाई देने वाले तथा न दिखाई देने वाले कीटों को हम विनष्ट करते हैं। जमीन पर चलने वाले, बिस्तर आदि में निवास करने वाले तथा द्रुतगति से इधर-उधर घूमने वाले समस्त कीटों को हम ‘वाचा’ (वाणी-मन्त्रशक्ति अथवा वच से बनी औषधि) के द्वारा विनष्ट करते हैं ॥२॥

३२७. अल्गण्डून् हन्मि महता वधेन दूना अदूना अरसा अभूवन्।
शिष्टानशिष्टान् नि तिरामि वाचा यथा क्रिमीणां नकिरुच्छिषातै॥३॥

अनेक स्थानों में रहने वाले कीटाणुओं को हम बृहत् साधन रूप मंत्र के द्वारा विनष्ट करते हैं। चलने वाले तथा न चलने वाले समस्त कीटाणु सूखकर विनष्ट हो गये हैं। बचे हुए तथा न बचे हुए कीटाणुओं को हम वाचा (वाणी-मंत्रशक्ति अथवा वच से बनी औषधि) के द्वारा विनष्ट करते हैं॥३॥

३२८. अन्वान्त्र्यं शीर्षण्य१मथो पाष्टेयं क्रिमीन।
अवस्कवं व्यध्वरं क्रिमीन् वचसा जम्भयामसि॥४॥

आँतों में, सिर में और पसलियों में रहने वाले कीटाणुओं को हम विनष्ट करते हैं। रेंगने वाले और विविध मार्ग बनाकर चलने वाले कीटाणुओं को भी हम ‘वाचा’ से विनष्ट करते हैं ॥४॥

३२९. ये क्रिमय: पर्वतेषु वनेष्वोषधीषु पशुष्वप्स्व१न्तः।
ये अस्माकं तन्वमाविविशुः सर्वं तद्धन्मि जनिम क्रिमीणाम्॥५॥

वनों, पहाड़ों, ओषधियों तथा पशुओं में रहने वाले कीटाणुओ और हमारे शरीर में प्रविष्ट होने वाले कीटाणुओं की समस्त उत्पत्ति को हम विनष्ट करते हैं ॥५॥

– भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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