अथर्ववेद – Atharvaveda – 2:34 – पशुगण सूक्त

अथर्ववेद संहिता
॥अथ द्वितीय काण्डम्॥
[३४- पशुगण सूक्त]

[ ऋषि – अथर्वा। देवता -१ पशुपति, २ देवगण, ३ अग्नि, विश्वकर्मा, ४ वायु प्रजापति, ५ आशीर्वचन। छन्द – त्रिष्टुप्।]

३४३. य ईशे पशुपति: पशूनां चतुष्पदामुत यो द्विपदाम्।
निष्क्रीतः स यज्ञियं भागमेतु रायस्पोषा यजमानं सचन्ताम्॥१॥

जो पशुपति (शिव) दो पैर वाले मनुष्यों तथा चार पैर वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे सम्पूर्ण रूप से ग्रहण किये हुए यज्ञीय भाग को प्राप्त करें और मुझ यजमान को ऐश्वर्य तथा पुष्टि प्रदान करें॥१॥

३४४. प्रमुञ्चन्तो भुवनस्य रेतो गातुं धत्त यजमानाय देवाः।
उपाकृतं शशमानं यदस्थात् प्रियं देवानामप्येतु पाथः॥२॥

हे देवो ! आप इस यजमान को विश्व का रेतस् (उत्पादक रस) प्रदान करके इसे सन्मार्ग पर चलाएँ और देवों का प्रिय तथा सुसंस्कृत सोम रूप अन्न हमें प्रदान करें ॥२॥

३४५. ये बध्यमानमनु दीध्याना अन्वैक्षन्त मनसा चक्षुषा च।
अग्निष्टानग्रे प्र मुमोक्तु देवो विश्वकर्मा प्रजया संरराणः॥३॥

जो आलोकमान जीव इस बद्ध जीव का मन तथा चक्षु से अवलोकन करते हैं, उन्हें वे विश्वकर्मा देव सबसे पहले विमुक्त करें ॥३॥

३४६. ये ग्राम्याः पशवो विश्वरूपा विरूपाः सन्तो बहुधैकरूपाः।
वायुष्टानग्रे प्र मुमोक्तु देवः प्रजापतिः प्रजया संरराणः॥४॥

ग्राम के जो अनेकों रूप-रंग वाले पशु बहुरूपता होने पर भी एक जैसे दिखलाई पड़ते हैं, उनको भी प्रजा के साथ निवास करने वाले प्रजापालक प्राणदेव सबसे पहले मुक्त करें॥४॥

३४७. प्रजानन्तः प्रति गृहणन्तु पूर्वे प्राणमङ्गेभ्यः पर्याचरन्तम्।
दिवं गच्छ प्रति तिष्ठा शरीरैः स्वर्ग याहि पथिभिर्देवयानैः॥५॥

विशेषज्ञ विद्वान्, चारों ओर विचरण करने वाले प्राण को समस्त अंगों से इकट्ठा करके स्वस्थ जीवनयापन करते हैं। उसके बाद देवताओं के गमन पथ से स्वर्ग को जाते हैं तथा आलोकमान स्थानों को प्राप्त होते हैं ॥५॥

– भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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