अथर्ववेद – Atharvaveda – 3:04 – राजासंवरण सूक्त

अथर्ववेद संहिता
॥अथ तृतीय काण्डम्॥
[४ – राजासंवरण सूक्त]

[ ऋषि – अथर्वा। देवता – इन्द्र। छन्द -त्रिष्टुप, १ जगती, ४, ५ भुरिक् त्रिष्टुप्।]

३७९. आ त्वा गन् राष्ट्रं सह वर्चसोदिहि प्राङ् विशां पतिरेकराट् त्वं वि राज।
सर्वास्त्वा राजन् प्रदिशो ह्वयन्तूपसद्यो नमस्यो भवेह॥१॥

हे राजन् ! (तेजस्वी) यह राष्ट्र (प्रकाशवान् अधिकार क्षेत्र) आपको पुन: प्राप्त हो गया है। आप वर्चस्वपूर्वक अभ्युदय को प्राप्त करें। आप प्रजाओं के स्वामी तथा उनके एक मात्र अधिपति बनकर सुशोभित हों। समस्त दिशाएँ तथा उपदिशाएँ आपको पुकारें। आप यहाँ (अपने क्षेत्र में) सबके लिए वन्दनीय बने॥१॥

३८०. त्वां विशो वृणतां राज्याय त्वामिमाः प्रदिश: पञ्च देवीः।
वर्मन् राष्ट्रस्य ककुदि श्रयस्व ततो न उग्रो वि भजा वसूनि॥२॥

हे तेजस्विन्! ये प्रजाएँ आपको शासन का संचालन करने के लिए स्वीकार करें तथा पाँचों दिव्य दिशाएँ आपकी सेवा करें। आप राष्ट्र के श्रेष्ठ पद पर आसीन हों और उग्रवीर होकर हमें योग्यतानुसार ऐश्वर्य प्रदान करें ॥२॥

३८१. अच्छ त्वा यन्तु हविनः सजाता अग्नि तो अजिर: सं चरातै।
जायाः पुत्राः सुमनसो भवन्तु बहुं बलिं प्रति पश्यासा उग्रः॥३॥

हे तेजस्विन् ! हवन करने वाले या बुलाने वाले सजातीय जन आपके अनुकूल रहें। दूतरूप में अग्निदेव तीव्रता से संचरित हों। स्त्री-बच्चे श्रेष्ठमन वाले हों। आप उग्रवीर होकर विभिन्न उपहारों को देखें (प्राप्त करे)॥३॥

३८२. अश्विना त्वाग्रे मित्रावरुणोभा विश्वे देवा मरुतस्त्वा ह्वयन्तु।
अधा मनोवसुदेयाय कृणुष्व ततो न उग्रो वि भजा वसूनि ॥४॥

हे तेजस्विन् ! मित्रावरुण, अश्विनीकुमार, विश्वेदेवा तथा मरुद्गण आपको बुलाएँ। आप अपने मन को धनदान में लगाएँ और प्रचण्डवीर होकर हमको भी यथायोग्य ऐश्वर्य प्रदान करें॥४॥

३८३. आ प्र द्रव परमस्याः परावतः शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्।
तदयं राजा वरुणस्तथाह स त्वायमह्वत् स उपेदमेहि॥५॥

हे तेजस्विन् ! आप दूर देश से भी द्रुतगति से यहाँ पधारे। द्यावा-पृथिवी आपके लिए कल्याणकारी हों। राजा वरुण भी आपका आवाहन करते हैं, इसलिए आप आएँ और इसे प्राप्त करें॥५॥

३८४. इन्द्रेन्द्र मनुष्या३: परेहि सं ह्यज्ञास्था वरुणैः संविदानः।
स त्वायमह्वत् स्वे सधस्थे स देवान् यक्षत् स उ कल्पयाद् विशः॥६॥

हे शासकों के शासक (इन्द्रदेव) ! आप मनुष्यों के समीप पधारें। वरुणदेव से संयुक्त होकर आप जाने गए हैं। अत: इन प्रत्येक धारणकर्ताओं ने आपको अपने स्थान पर बुलाया है। ऐसे आप, देवताओं का यजन करते हुए प्रजाओं को अपने-अपने कर्तव्य में नियोजित करें॥६॥

३८५. पथ्या रेवतीर्बहुधा विरूपाः सर्वाः सङ्गत्य वरीयस्ते अक्रन्।
तास्त्वा सर्वाः संविदाना ह्वयन्तु दशमीमुग्रः सुमना वशेह॥७॥

हे तेजस्विन्! विभूति-सम्पन्न, मार्ग पर (लक्ष्य की ओर) चलने वाली, विविधरूप वाली प्रजाओं ने संयुक्तरूप से आपके लिए यह वरणीय (पद) बनाया है। वे सब आपको एक मत होकर बुलाएँ। आप उग्रवीर एवं श्रेष्ठ मन वाले होकर दसमी (चरमावस्था) को अपने अधीन करें ॥७॥

– भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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