अथर्ववेद – Atharvaveda – 3:22 – वर्चः प्राप्ति सूक्त

अथर्ववेद संहिता
अथ तृतीय काण्डम्
[२२- वर्चः प्राप्ति सूक्त]

[ ऋषि – वसिष्ठ। देवता – बृहस्पति, विश्वेदेवा, वर्चस्। छन्द – अनुष्टुप्, १ विराट् त्रिष्टुप्, ३ पञ्चपदा परानुष्टुप् विराट् अति जगती, ४ त्र्यवसाना षट्पदा जगती।]

५२२. हस्तिवर्चसं प्रथतां बृहद् यशो अदित्या यत् तन्वः संबभूव।
तत् सर्वे समदुर्मह्यमेतद् विश्वे देवा अदितिः सजोषाः॥१॥

हमें हाथी के समान महान तेजस् (अजेय शक्ति) प्राप्त हो। जो तेजस् देवमाता अदिति के शरीर से उत्पन्न हुआ है, उस तेजस् को समस्त देवगण तथा देवमाता अदिति प्रसन्नतापूर्वक हमें प्रदान करें॥१॥

५२३. मित्रश्च वरुणश्चन्द्रो रुद्रश्च चेततु।
देवासो विश्वधायसस्ते माञ्जन्तु वर्चसा॥२॥

मित्रावरुण, इन्द्र तथा रुद्रदेव हमें उत्साह प्रदान करें। विश्व को धारण करने वाले सूर्य (इन्द्र) आदि देव अपने तेजस् से हमें सुसमृद्ध करें॥२॥

५२४. येन हस्ती वर्चसा संबभूव येन राजा मनुष्येष्वप्स्व१न्तः।
येन देवा देवतामग्र आयन् तेन मामद्य वर्चसाग्ने वर्चस्विनं कृणु॥३॥

जिस तेजस् से हाथी बलवान् होता है। राजा मनुष्यों में तेजस्वी होता है, जलचर प्राणी शक्ति-सम्पन्न होते हैं और जिसके द्वारा देवताओं ने सर्वप्रथम देवत्व प्राप्त किया था, उसी तेजस के द्वारा आप हमें वर्चस्वी बनाएँ॥३॥

५२५. यत् ते वर्चो जातवेदो बृहद् भवत्याहुतेः।
यावत् सूर्यस्य वर्च आसुरस्य च हस्तिनः।
तावन्मे अश्विना वर्च आ धत्तां पुष्करस्रजा॥४॥

उत्पन्न प्राणियों को जानने वाले तथा हवियों द्वारा आवाहन किये जाने वाले हे अग्निदेव ! आपके अन्दर तथा सूर्य के अन्दर जो प्रखर तेजस् है, उस तेजस् को कमल पुष्प की माला धारण करने वाले अश्विनीकुमार, हममें स्थापित करें॥४॥

५२६. यावच्चतस्रः प्रदिशश्चक्षुर्यावत् समश्नुते।
तावत् समैत्विन्द्रियं मयि तद्धस्तिवर्चसम्॥५॥

जितने स्थान को चारों दिशाएँ घेरती हैं और नेत्र नक्षत्र मण्डल के जितने स्थान को देख सकते हैं, परम ऐश्वर्य सम्पन्न इन्द्रदेव का उतना बड़ा चिह्न हमें प्राप्त हो और हाथी के समान वह वर्चस् भी हमें प्राप्त हो॥५॥

५२७. हस्ती मृगाणां सुषदामतिष्ठावान् बभूव हि।
तस्य भगेन वर्चसाऽभि षिञ्चामि मामहम्॥६॥

जैसे वन में विचरण करने वाले मृग आदि पशुओं में हाथी प्रतिष्ठित होता है, उसी प्रकार श्रेष्ठतम तेजस् और ऐश्वर्य के द्वारा हम अपने आपको अभिषिक्त करते हैं ॥६॥

– भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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