February 28, 2021

अथर्ववेद संहिता – 4:02 – आत्मविद्या सूक्त

अथर्ववेद संहिता
अथ चतुर्थ काण्डम्
[२- आत्मविद्या सूक्त]

[ ऋषि – वेन। देवता – आत्मा। छन्द – त्रिष्टुप्, ६ पुरोऽनुष्टुप् , त्रिष्टुप्, ८ उपरिष्टात् ज्योति त्रिष्टुप्।]

इस सूक्त के ८ मंत्रों में स्थायी पद है “कस्मै देवाय हविषा विधेम”। इसी स्थायी पद के साथ ऋ० १०.१२१ में ९ मंत्र हैं। इस सूक्त के क्र०१से ८ तक के मंत्र ऋग्वेद के मन्त्रों से पूर्ण या आंशिकरूप से मिलते हैं, क्रमसंख्या भिन्न है। ऋग्वेद के सूक्त के ऋषि ‘हिरण्यगर्भ’ हैं तथा देवता ‘कः’ हैं। इस सूक्त के ऋषि ‘वेन’ तथा देवता ‘आत्मा’ है। अर्थ की दृष्टि से ‘वेन’ और ‘हिरण्यगर्भ’ दोनों का अर्थ दिव्य तेजोयुक्त होता है। देवता के रूप में ‘कः’ सम्बोधन अव्यक्त के लिए है। वह परमात्मा एवं आत्मा दोनों के लिए उपयुक्त है; किन्तु अथर्ववेद के ऋषि ने आग्रहपूर्वक ‘आत्मा’ को लक्ष्य करके यह सूक्त कहा है। अस्तु, उसी भाव को लक्ष्य करके मंत्रार्थ किये गये हैं। ऋषि स्वयं ही प्रश्न उठा रहे हैं तथा स्वयं ही समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं –

५९८. य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः।
यो३स्येशे द्विपदो यश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥१॥

(प्रश्न है, हम किस देवता की अर्चना हवि-समर्पण सहित करें? उत्तर है) जो स्वयं का बोध कराने तथा बल प्रदान करने में समर्थ है, जिसके अनुशासन का पालन सभी देवशक्तियाँ करती हैं, जो दोपायों (मनुष्यादि) तथा चौपायों (पशु आदि) सभी का शासक है, उस ‘क’ संज्ञक आत्मतत्त्व का पूजन करें॥१॥

५९९. यः प्राणतो निमिषतो महित्वैको राजा जगतो बभूव।
यस्य च्छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥२॥

(किस देवता की अर्चना करें?) जो प्राणधारियों तथा आँखें झपकने वालों ( देखने वालों अथवा परिवर्तनशीलों) का एकमात्र अधिपति है, जिसकी छाया में अमरत्व तथा मृत्यु दोनों स्थित हैं, उसी की अर्चना हम करें॥२॥

६००. यं क्रन्दसी अवतश्चस्कभाने भियसाने रोदसी अह्वयेथाम्।
यस्यासौ पन्था रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥३॥

(किस देवता का पूजन करें?) जिसके कारण द्यावा-पृथिवी (लोक) सुख-दुःख सहित सबको संरक्षण देने के लिए स्थित हैं तथा वे भयभीत होकर जिसे पुकारते हैं, जिसका प्रकाशयुक्त पथ विशिष्ट सम्मान बढ़ाने वाला है, उसी का पूजन-वन्दन करें॥३॥

६०१. यस्य द्यौरुर्वी पृथिवी च मही यस्याद उर्व१न्तरिक्षम्।
यस्यासौ सूरो विततो महित्वा कस्मै देवाय हविषा विधेम॥४॥

(किस देवता का भजन करें?) जिसकी महत्ता से व्यापक धुलोक, विशाल पृथिवी, फैला हुआ अन्तरिक्ष तथा सूर्य आदि का विस्तार हुआ है, उसी का हम यजन करें॥४॥

६०२. यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा समुद्रे यस्य रसामिदाहुः।
इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥५॥

(किस देवताको पूजें?) जिसकी महिमा की घोषणा करने वाले विश्व के हिमाच्छादित क्षेत्र, समुद्र तथा पृथिवी हैं, यह दिशाएँ जिसकी बाहुएँ हैं, उसी की हम पूजा करें॥५॥

६०३. आपो अग्रे विश्वमावन् गर्भं दधाना अमृता ऋतज्ञाः।
यासु देवीष्वधि देव आसीत् कस्मै देवाय हविषा विधेम॥६॥

(किस देवता की अर्चना करें?) जिस अमृतरूप, ऋत को समझने वाले ने आप: (सृष्टि के मूल-क्रियाशील प्रवाह) के रूप में गर्भ धारण करके विश्व को गतिशील किया; जिसकी दिव्यशक्ति के अधीन देवता रहते हैं, उसी की अर्चना हम करें॥६॥

६०४. हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीमुत द्यां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥७॥

(किस देव की अभ्यर्थना करें?) पहले (सष्टि के आदिकाल में) हिरण्यगर्भ (तेजको गर्भ में धारण करने वाला) सम्यकपरूप से विद्यमान था। वही सभी उत्पन्न ( पदार्थों एवं प्राणियों) का एकमात्र अधिष्ठाता है। वही पृथ्वी एवं धुलोक आदि का आधार है। (उसके अतिरिक्त) हम और किस देव की अभ्यर्थना करें?

६०५. आपो वत्सं जनयन्तीर्गर्भमग्रे समैरयन्।
तस्योत जायमानस्योल्ब आसीद्धिरण्ययः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥८॥

(हम किस देवता की उपासना करें ?) प्रारम्भ में वत्स (बालक या सृष्टि) को जन्म देने वाली आप: (सृष्टि के मूल तत्त्व) की धाराएँ गर्भ को प्रकट करने वाली हैं। उस जन्म लेने वाले (शिशु या विश्व) की रक्षक झिल्ली (आवरण) के रूप में जो तेज अवस्थित रहता है, हम उसी दिव्य तेज की उपासना करें ॥८॥

– भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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