अथर्ववेद संहिता – 4:04 – वाजीकरण सूक्त

अथर्ववेद संहिता
अथ चतुर्थ काण्डम्
[४- वाजीकरण सूक्त]

[ ऋषि – अथर्वा। देवता – वनस्पति। छन्द -अनुष्टुप, ४ पुर उष्णिक,६-७ भुरिक अनुष्टुप्।]

इस सूक्त में बल-वीर्यवर्द्धक ओषधि का उल्लेख है। आचार्य सायण ने इसे कपित्थ से जोड़ा है। खोदकर निकालने के कारण इसे कपित्थ (कैथ) की जड़ भी माना जाता है। ओषधि शाखियों के लिए यह शोध का विषय है-

६१३. यां त्वा गन्धर्वो अखनद् वरुणाय मृतभ्रजे।
तां त्वा वयं खनामस्योषधि शेपहर्षणीम्॥१॥

हे ओषधे ! वरुण (वरुणदेव अथवा वरणीय मनुष्य) के लिए आपको गन्धर्व ने खोदा था। हम भी इन्द्रिय-शक्ति बढ़ाने वाली,आपको खोदते हैं ॥१॥

६१४. उदुषा उदु सूर्य उदिदं मामकं वचः।
उदेजतु प्रजापतिर्वृषा शुष्मेण वाजिना॥२॥

(ओषधि को) उषा देवी शक्ति सम्पन्न वीर्य से समृद्ध करें। हमारा यह मन्त्रात्मक वेचन भी इसे बढ़ाए। वर्षणकारी प्रजापतिदेव भी इसे बल-वीर्य से युक्त करके उन्नत करें॥२॥

६१५. यथा स्म ते विरोहतोऽभितप्तमिवानति।
ततस्ते शुष्मवत्तरमियं कृणोत्वोषधिः॥३॥

(हे पुरुष ) विशेष सन्दर्भ में कर्मारूढ़ होने पर जब शरीर के अंग तप्त होकर गतिशील होते हैं, तब यह ओषधि आपको असीम बल-वीर्य से युक्त करे॥३॥

६१६. उच्छुष्पौषधीनां सार ऋषभाणाम्।
सं पुंसामिन्द्र वृष्ण्यमस्मिन् धेहि तनूवशिन्॥४॥

अन्य वीर्यवर्द्धक ओषधियों में यह ओषधि अत्यधिक श्रेष्ठ सिद्ध हो। काया को वश में करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप पौरुषयुक्त शक्ति इस (ओषधि) में स्थापित करें॥४॥

६१७. अपां रसः प्रथमजोऽथो वनस्पतीनाम्।
उत सोमस्य भ्रातास्युतार्शमसि वृष्ण्यम्॥५॥

हे ओषधे ! जल मंथन के समय आप पहले उत्पन्न हुई अमृतोपम रस हैं और वनस्पतियों में साररूप हैं। आप सोमरस की सहोदरा हैं और अङ्गिरा आदि ऋषियों के मंत्र-बल से प्रकट वीर्यरूप हैं॥५॥

६१८.अद्याग्ने अद्य सवितरद्य देवि सरस्वति।
अद्यास्य ब्रह्मणस्पते धनुरिवा तानया पसः॥६॥

हे अग्निदेव ! हे सवितादेव ! हे सरस्वतीदेवि ! हे ब्रह्मणस्पते ! आप इस मनुष्य की इन्द्रियों को बल-वीर्य प्रदान करके उसे धनुष के समान (प्रहारक) बनाएँ ॥६॥

६१९. आहं तनोमि ते पसो अधि ज्यामिव धन्वनि।
क्रमस्वर्श इव रोहितमनवग्लायता सदा॥७॥

(हे मनुष्य !) हम आपकी इन्द्रियों को धनुष पर प्रत्यञ्चा तानने के समान बल-सम्पन्न बनाते हैं। अस्तु, आप बलशाली के समान अपने कर्म पर आरूढ़ हो॥७॥

६२०. अश्वस्याश्वतरस्याजस्य पेत्वस्य च।
अथ ऋषभस्य ये वाजास्तानस्मिन् धेहि तनूवशिन्॥८॥

हे ओषधे ! घोड़ा, बैल, मेढ़ा (नर-भेड़) आदि में शरीर को वश में करने वाला जो ओजस् है, उसे ( इस व्यक्ति के शरीर में ) स्थापित करें ॥८॥

– भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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