अथर्ववेद संहिता – 4:20 – पिशाचक्षयण सूक्त

अथर्ववेद संहिता
अथ चतुर्थ काण्डम्
[२० – पिशाचक्षयण सूक्त]

[ ऋषि – मातृनामा। देवता – मातृनामौषधि। छन्द – अनुष्टुप, १ स्वराट् अनुष्टप, ९ भुरिक अनुष्टुप्।]

इस सूक्त के ऋषि एवं देवता दोनों ही ‘मातृनामा’ हैं। मातृनामा का एक अर्थ होता है ‘माता है नाम जिनका’। इस आधार पर सूक्त मंत्रों में देवी सम्बोधन सर्वव्यापी मातृसत्ता को लक्ष्य करके कहा गया प्रतीत होता है। कौशिक सूत्र के विनियोग के आधार पर सायण आदि आचार्यों ने इसे ‘त्रिसन्ध्या-मणि’ अथवा ‘सदम्पुष्पा ‘ के साथ जोड़ा है। हितकारिणी मणि या ओषधि के लिए ‘माता-देवि’ जैसे सम्बोधन उचित भी हैं। मातृनाम-मातृसत्ता को किसी ओषधि में संव्याप्त देखना तो उचित है, किन्तु उसे वहीं तक सीमित मानना उचित नहीं प्रतीत होता। मंत्रों में उस देवी के जो व्यापक प्रभाव कहे गये हैं, वे किसी भौतिक पदार्थ के लिए अतिरंजित लगते हैं। किसी दिव्य सत्ता के लिए ही वे स्वाभाविक हो सकते हैं-

७५१. आ पश्यति प्रति पश्यति परा पश्यति पश्यति।
दिवमन्तरिक्षमाद् भूमि सर्वं तद् देवि पश्यति॥१॥

वह देवी (मातृनामा-दिव्यदृष्टि) देखती हैं, दूर तक देखती है, विशेष कोण से देखती है, समग्र रूप से देखती है। द्युलोक, अन्तरिक्ष एवं पृथ्वी सभी को वह देवी देखती है ॥१॥

७५२. तिस्रो दिवस्तिस्रः पृथिवी: षट् चेमाः प्रदिशः पृथक्।
त्वयाह सर्वा भूतानि पश्यानि देव्योषधे॥२॥

हे देवि ! आपके प्रभाव से हम तीनों द्युलोक, तीनों पृथ्वीलोक, इन छहों दिशाओं तथा (उसमें निवास करने वाले) समस्त प्राणियों को प्रत्यक्ष देखते हैं ॥२॥

[यह सृष्टि तीन आयामों वाली (थ्री डायमेंशनल) कही गई है, द्युलोक तथा पृथ्वी के तीनों आयामों में देखने की क्षमता अथवा द्यावा-पृथिवी की त्रिगुणात्मकता को समझने का भाव यहाँ परिलक्षित होता है। दिशाएँ चारों ओर की चार तथा ऊपर नीचे मिलाकर छः होना तो मान्य है ही।]

७५३. दिव्यस्य सुपर्णस्य तस्य हासि कनीनिका।
सा भूमिमा रुरोहिथ वा श्रान्ता वधूरिव॥३॥

हे देवि ! स्वर्ग में स्थित उस सुपर्ण (गरुड़ या सूर्य) के नेत्रों की आप कनीनिका हैं । जिस प्रकार थकी हुई स्त्री पालकी पर आरूढ़ होती है, उसी प्रकार पृथ्वी पर आपका आरोहण (अवतरण) हुआ है ॥३॥

७५४. तां मे सहस्राक्षो देवो दक्षिणे हस्त आ दधत्।
तयाहं सर्वं पश्यामि यश्च शूद्र उतार्यः॥४॥

हजारों नेत्रों वाले (इन्द्रदेव या सूर्य) ने इसे हमारे दाहिने हाथ में रखा है। हे ओषधे ! उसके माध्यम से हम शूद्रों और आर्यों सभी को देखते हैं ॥४॥

७५५. आविष्कृणुष्व रूपाणि मात्मानमप गृहथाः।
अथो सहस्त्रचक्षो त्वं प्रति पश्याः किमीदिनः॥५॥

हे देवि ! आप राक्षसों आदि को दूर करने वाले अपने स्वरूप को प्रकट करें, अपने को छिपाएँ नहीं। हे हजारों आँखों से देखने वाली देवि ! गुप्तरूप से विचरण करने वाले पिशाचों से हमारी सुरक्षा करने के लिए आप उन्हें देखें ॥५॥

७५६. दर्शय मा यातुधानान् दर्शय यातुधान्यः।
पिशाचान्त्सर्वान् दर्शयेति त्वा रभ ओषधे॥६॥

हे देवि ! आप असुरों को हमें दिखाएँ, जिससे वे गुप्तरूप में रहकर हमें कष्ट न दे सके। आप यातुधानियों तथा समस्त प्रकार की पिशाचियों को भी हमें दिखाएं, इसीलिए हम आपको धारण करते हैं॥६॥

७५७. कश्यपस्य चक्षुरसि शुन्याश्च चतुरक्ष्याः।
वीघ्रे सूर्यमिव सर्पन्तं मा पिशाचं तिरस्करः॥७॥

हे ओषधे ! आप कश्यप (ऋषि अथवा सर्वद्रष्टा) की आँख हैं और चार आँखों वाली देवशुनि की भी आँख है। ग्रह-नक्षत्रों आदि से सम्पन्न आकाश में सूर्य के सदृश विचरण करने वाले पिशाचों को आप न छिपने दें॥७॥

७५८.उदग्रभं परिपाणाद् यातुधानं किमीदिनम् ।
तेनाहं सर्वं पश्याम्युत शूद्रमुतार्यम्॥८॥

रक्षण-साधनों के द्वारा हमने राक्षसों को वशीभूत कर लिया है। उसके द्वारा हम शूद्रों अथवा आर्यों से युक्त समस्त ग्रहों को देखते हैं॥८॥

७५९. यो अन्तरिक्षेण पतति दिवं यश्चातिसर्पति।
भूमिं यो मन्यते नाथं तं पिशाचं प्रदर्शय॥९॥

जो अन्तरिक्ष से नीचे आता है तथा द्युलोक को भी लाँघ जाता है, उस पिशाच को भी हमारी दृष्टि में ले आएँ॥९॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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