अथर्ववेद संहिता – 4:23 – पापमोचन सूक्त

अथर्ववेद संहिता
अथ चतुर्थ काण्डम्

[२३ – पापमोचन सूक्त]

[ ऋषि – मृगार। देवता – प्रचेता अग्नि। छन्द – त्रिष्टुप, ३ पुरस्ताद् ज्योतिष्मती त्रिष्टुप्, ४ अनुष्टुप्, ६ प्रस्तारपंक्ति।]

७७४. अग्नेर्मन्वे प्रथमस्य प्रचेतसः पाञ्चजन्यस्य बहुधा यमिन्धते।
विशोविश: प्रविशिवांसमीमहे स नो मुञ्चत्वंहसः॥१॥

बहुधा जिन्हें ईंधन द्वारा प्रदीप्त किया जाता है, प्रखर चेतना सम्पन्न, प्रथम (श्रेष्ठतम) स्तर वाले, पाँचों द्वारा उपासनीय अग्निदेव को हम नमन करते हैं। समस्त विश्व (के घटकों) में जो प्रविष्ट हैं, उनसे हम याचना करते हैं कि वे हमें पापों से मुक्त कराएँ ॥१॥

[अग्निदेव की आराधना पाँच यज्ञों (देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज, मनुष्ययज्ञ तथा ब्रह्मयज्ञ) द्वारा की जाती है। पाँच जन (चारों वर्ण तथा निषाद) उनकी उपासना करते हैं। पाँच प्राणों, पाँच इन्द्रियों आदि के भी वे उपासनीय हैं।]

७७५. यथा हव्यं वहसि जातवेदो यथा यज्ञं कल्पयसि प्रजानन्।
एवा देवेभ्यः सुमतिं न आ वह स नो मुञ्चत्वंहसः॥२॥


हे जातवेदा अग्ने ! जिस प्रकार आप पूजनीय देवों के पास हवि पहुँचाते हैं तथा यज्ञ के भेदों को जानते हुए उनको रचते हैं, उसी प्रकार देवों के पास से हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्राप्त कराएँ और समस्त पापों से मुक्त कराएँ॥२॥

[यज्ञ से- अग्निदेव से सुमति की याचना की गई है, सुमति ही पाप-कर्मों से बचा सकती है।]

७७६. यामन्यामन्नुपयुक्तं वहिष्ठं कर्मकर्मन्नाभगम्।
अग्निमीडे रक्षोहणं यज्ञवृधं घृताहुतं स नो मुञ्चत्वंहसः॥३॥


प्रत्येक यज्ञ के आधाररूप, हवि पहुँचाने वाले और प्रत्येक कर्म में सेवन करने योग्य अग्निदेव की हम प्रार्थना करते हैं। वे अग्निदेव राक्षसों के संहारक तथा यज्ञों को बढ़ाने वाले हैं। घृताहुतियों से जिनको प्रदीप्त करते हैं, ऐसे अग्निदेव हमें पाप से मुक्त कराएँ॥३॥

७७७. सुजातं जातवेदसमग्निं वैश्वानरं विभुम्। हव्यवाहं हवामहे स नो मुञ्चत्वंहसः॥४॥

श्रेष्ठ जन्मवाले, उत्पन्न पदार्थों को जानने वाले तथा समस्त उत्पन्न प्राणी जिनको जानते हैं, ऐसे मनुष्य हितैषी, हव्यवाहक-वैश्वानर अग्निदेव का हम आवाहन करते हैं, वे अग्निदेव हमें समस्त पापों से मुक्त करें॥४॥

७७८. येन ऋषयो बलमद्योतयन् युजा येनासुराणामयुवन्त मायाः।
येनाग्निना पणीनिन्द्रो जिगाय स नो मुञ्चत्वंहसः॥५॥


जिन ऋषियों ने अग्निदेव के साथ मैत्री स्थापित करके आत्मशक्ति को जाग्रत् किया है तथा जिन अग्निदेव की सहायता से देवताओं ने राक्षसों की कपटयुक्तियों को दूर किया है और जिनके द्वारा इन्द्रदेव ने ‘पणि’ नामक असुरों को विजित किया है, वे अग्निदेव हमें समस्त पापों से मुक्त करें॥५॥

७७९. येन देवा अमृतमन्वविन्दन् येनौषधीर्मधुमतीरकृण्वन्।
येन देवाः स्व१राभरन्त्स नो मुञ्चत्वंहसः॥६॥

जिन अग्निदेव की सहायता से देवताओं ने अमरत्व को प्राप्त किया, जिनकी सहायता से देवताओं ने ओषधियों को मधुर रस से सम्पन्न किया और जिनकी कृपा से देवत्व के अभिलाषी यजमान स्वर्ग को प्राप्त करते हैं, वे अग्निदेव हमें समस्त पापों से मुक्त करें॥६॥

७८०. यस्येदं प्रदिशि यद् विरोचते यज्जातं जनितव्यं च केवलम्।
स्तौम्यग्निं नाथितो जोहवीमि स नो मुञ्चत्वंहसः॥७॥

जिन अग्निदेव के शासन में समस्त संसार विद्यमान है, जिनके तेज से ग्रह-नक्षत्र आदि आलोकित होते हैं तथा पृथ्वी पर उत्पन्न समस्त प्राणी जिनके अधीन हैं, उन अग्निदेव की हम प्रार्थना करते हुए बारम्बार उनका आवाहन करते हैं ॥७॥

– वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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