September 26, 2021

अथर्ववेद – Atharvaveda – 4:15 – वृष्टि सूक्त

अथर्ववेद संहिता
अथ चतुर्थ काण्डम्
[१५ – वृष्टि सूक्त]

[ ऋषि – अथर्वा। देवता – १ दिशा, २-३ वीरुध,४ मरुद्गण, पर्जन्य, ५-९ मरुद्गण, १० अग्नि, ११ स्तनयित्नु, प्रजापति, १२ वरुण, १३-१५ मण्डूकसमूह, पितरगण, १६ वात। छन्द – त्रिष्टुप्, १-२,५ विराट जगती, ४ विराट पुरस्ताद् बृहती,७-८,१३-१४ अनुष्टुप्,९ पथ्यापंक्ति, १० भुरिक त्रिष्टुप्, १२ पञ्चपदा अनुष्टुब्गर्भा भुरिक् त्रिष्टुप्, १५ शंकुमती अनुष्टुप्।]

७०२. समुत्पतन्तु प्रदिशो नभस्वतीः समभ्राणि वातजूतानि यन्तु।
महऋषभस्य नदतो नभस्वतो वाश्रा आपः पृथिवीं तर्पयन्तु॥१॥

वायु से युक्त दिशाएँ बादलों के साथ उदित हों और वृष्टि के निमित्त जल वहन करने वाले बादल, वायु द्वारा प्रेरित होकर एकत्र हो। महा वृषभ के समान गर्जना करने वाले बादल जल के द्वारा पृथ्वी को तृप्त करें॥१॥

७०३. समीक्षयन्तु तविषाः सुदानवोऽपां रसा ओषधीभिः सचन्ताम्।
वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमि पृथग् जायन्तामोषधयो विश्वरूपाः॥२॥

श्रेष्ठ दानी मरुद्गण हमारे लिए जलवृष्टि कराए। जल के रस ओषधियों से संयुक्त हों। वृष्टि की जलधाराएँ पृथ्वी को समृद्ध करें और उनके द्वारा विविधरूप वाली ओषधियाँ उत्पन्न हों॥२॥

७०४. समीक्षयस्व गायतो नभांस्यपां वेगासः पृथगुद् विजन्ताम्।
वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमि पृथग् जायन्तां वीरुधो विश्वरूपाः॥३॥

हे मरुद्गण ! हम आपकी प्रार्थना करते हैं, इसलिए आप हमें जलयुक्त मेघों का दर्शन कराएँ। जल के प्रवाह अलग-अलग होकर गमन करें और वृष्टि की धाराएँ पृथ्वी को समृद्ध करें। विविधरूप वाली ओषधियाँ पृथ्वी पर उत्पन्न हों॥३॥

७०५. गणास्त्वोप गायन्तु मारुताः पर्जन्य घोषिणः पृथक्।
सर्गा वर्षस्य वर्षतो वर्षन्तु पृथिवीमनु॥४॥

हे पर्जन्यदेव ! गर्जना करने वाले मरुद्गण आपका अलग-अलग गुणगान करें। बरसते हुए मेघ की धाराओं से आप पृथ्वी को गीला करें॥४॥

७०६. उदीरयत मरुतः समुद्रतस्त्वेषो अर्को नभ उत् पातयाथ।
महऋषभस्य नदतो नभस्वतो वाश्रा आपः पृथिवीं तर्पयन्तु॥५॥

हे मरुद्देवो ! सूर्य की गर्मी के द्वारा आप बादलों को समुद्र से ऊपर की ओर ले जाएँ, उड़ाएँ और महा वृषभ (ऋषभ) के समान गर्जना करने वाले जल-प्रवाह से आप भूमि को तृप्त करें॥५॥

७०७. अभि क्रन्द स्तनयार्दयोदधि भूमि पर्जन्य पयसा समङ्ग्धि।
त्वया सृष्टं बहुलमैतु वर्षमाशारैषी कृशगुरेत्वस्तम्॥६॥

हे पर्जन्यदेव ! गड़गड़ाहट की गर्जना से युक्त होकर ओषधिरूप वनस्पतियों में गर्भ स्थापित करें। उदक-धारक रथ से गमन करें। उदक पूर्ण (जल पूर्ण) मेघों के मुख को नीचे करें और इसे खाली करें, ताकि उच्च और निम्न प्रदेश समतल हो सकें॥६॥

[जब मेघ गरजते हैं, तब विद्युत् के प्रभाव से नाइट्रोजन के उर्वर यौगिक (कम्पाउण्ड) बनते हैं। उनसे वनस्पतियों को शक्ति मिलती है।]

७०८. सं वोऽवन्तु सुदानव उत्सा अजगरा उत।
मरुद्भिः प्रच्युता मेघा वर्षन्तु पृथिवीमनु॥७॥

हे मनुष्यो ! श्रेष्ठ दानी मरुद्गण आपको तृप्त करें। अजगर की तरह मोटे जल-प्रवाह प्रकट हों और वायु के द्वारा प्रेरित बादल पृथ्वी पर वर्षा करें॥७॥

७०९. आशामाशां वि द्योततां वाता वान्तु दिशोदिशः।
मरुद्भिः प्रच्युता मेघाः सं यन्तु पृथिवीमनु॥८॥

दिशाओं-दिशाओं में विद्युत् चमके और सभी दिशाओं में वायु प्रवाहित हो। इसके बाद वायु द्वारा प्रेरित बादल धरती की ओर अनुकूलता से आगमन करें॥८॥

७१०. आपो विद्युदभ्रं वर्ष सं वोऽवन्तु सुदानव उत्सा अजगरा उत।
मरुद्भिः प्रच्युता मेघाः प्रावन्तु पृथिवीमनु॥९॥

हे श्रेष्ठ दानी मरुतो ! जल, विद्युत्, मेघ, वृष्टि तथा अजगर के समान आकार वाले आपके जल-प्रवाह संसार को तृप्त करें और आपके द्वारा प्रेरित बादल धरती की रक्षा करें॥९॥

७११. अपामग्निस्तनूभिः संविदानो य ओषधीनामधिपा बभूव।
स नो वर्ष वनुतां जातवेदाः प्राणं प्रजाभ्यो अमृतं दिवस्परि॥१०॥

मेघों के शरीररूप जल से एकरूप हुए विद्युताग्नि, उत्पन्न होने वाली वनौषधियों के पालक हैं। वे जातवेदा अग्निदेव हमें प्राणियों में जीवन-संचार करने वाली तथा स्वर्ग के अमृत को उपलब्ध कराने वाली वृष्टि प्रदान करें॥१०॥

७१२. प्रजापतिः सलिलादा समुद्रादाप ईरयन्नुदधिमर्दयाति।
प्रप्यायतां वृष्णो अश्वस्य रेतोऽर्वाडेतेन स्तनयित्नुनेहि॥११॥

प्रजापालक सूर्यदेव जलमय समुद्र से जल को प्रेरित करते हुए समुद्र को गति प्रदान करें। उनके द्वारा अश्व के समान गतिवाले तथा वृष्टि करने वाले बादलों से जल की वृद्धि हो। हे पर्जन्यदेव ! इन गर्जनकारी मेघों के साथ आप हमारे सम्मुख पधारें॥११॥

७१३. अपो निषिञ्चन्नसुरः पिता नः श्वसन्तु गर्गरा अपां वरुणाव नीचीरपः सृज।
वदन्तु पृश्निबाहवो मण्डूका इरिणानु॥१२॥

प्राणों को वृष्टि का जल प्रदान करने वाले हमारे पालक सूर्यदेव, वृष्टि के जल को तिरछे भाव से बरसाएँ। उस समय जल के गड़-गड़ शब्द करने वाले प्रवाह चलें। हे वरुणदेव ! आप भी पृथ्वी पर,आगमन करने वाले जल को बादलों से पृथक् करें। उसके बाद सफेद भुजा वाले मेढक पृथ्वी पर आकर शब्द करें॥१२॥

७१४. संवत्सरं शशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः।
वाचं पर्जन्यजिन्वितां प्रमण्डूका अवादिषुः॥१३॥

वर्ष भर गुप्त स्थिति में बने रहने वाले, व्रतपालक ब्राह्मणों (तपस्वियों) की भाँति रहने वाले मण्डूकगण, पर्जन्य को प्रसन्न (जीवन्त) करने वाली वाणी बोलने लगे हैं॥१३॥

[ मेढक सर्दियों में सुप्तावस्था (हाइवरेशन) की स्थिति में रहते हैं। ग्रीष्मकाल में तपन सहन करते हुए शान्त रहते हैं। तपस्वी ब्राह्मण भी अपनी तप:शक्ति बढ़ाते हुए वर्ष भर साधनारत रहते थे। उस तप के आधार पर ही प्रकृति से वाञ्छित अनुदान पाने के लिए वे प्राणवान् मंत्रों का प्रभावी प्रयोग कर पाते थे। उसी तथ्य का यहाँ आलंकारिक वर्णन है।]

७१५.उपप्रवद मण्डूकि वर्षमा वद तादुरि।
मध्ये हृदस्य प्लवस्व विगृह्य चतुरः पदः॥१४॥

हे मण्डूकि! आप हर्षित होकर वेगपूर्वक ध्वनि करें। हे तादुरि ! आप वर्षा के जल को बुलाएँ और तालाब में अपने चारों पैरों को फैलाकर तैरें॥१४॥

७१६. खण्वखा३इ खैमखा३इ मध्ये तदुरि।
वर्षं वनुध्वं पितरो मरुतां मन इच्छत॥१५॥

हे खण्वखे (बिलवासी) ! हे षैमखे (शान्त रहने वाली) ! हे तदुरि (छोटी मेढकी) ! तुम वर्षा के बीच आनन्दित होओ? हे पितरो ! आप मरुद्गणों के मन को अनुकूल इच्छा युक्त बनाओ॥१५॥

७१७. महान्तं कोशमुदचाभि षिञ्च सविद्युतं भवतु वातु वातः।
तन्वतां यज्ञं बहुधा विसृष्टा आनन्दिनीरोषधयो भवन्तु॥१६॥

हे पर्जन्यदेव ! आप अपने जलरूपी महान् कोश को विमुक्त करें और उसे नीचे बहाएँ, जिससे ये जल से परिपूर्ण नदियाँ अबाधित होकर पूर्व की ओर प्रवाहित हों। आप जल-राशि से द्यावा-पृथिवी को परिपूर्ण करें, ताकि हमारी गौओं को उत्तम पेय जल प्राप्त हो ॥१६॥

– भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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