September 26, 2021

अथर्ववेद – Atharvaveda – 4:17 – अपामार्ग सूक्त

अथर्ववेद संहिता
अथ चतुर्थ काण्डम्
[१७ – अपामार्ग सूक्त]

[ ऋषि – शुक्र। देवता – अपामार्ग वनस्पति। छन्द – अनुष्टुप्।]

७२७. ईशानां त्वा भेषजानामुज्जेष आ रभामहे।
चक्रे सहस्रवीर्यं सर्वस्मा ओषधे त्वा॥१॥

हे ओषधे! रोग निवारण के लिए ओषधिरूप में प्रयुक्त होने वाली अन्य ओषधियों की आप स्वामिनी हैं। हम आपका आश्रय ग्रहण करते हैं। हे ओषधे ! समस्त रोगों के निवारण के लिए हम आपको सहस्र-वीर्यों से सम्पन्न करते हैं॥१॥

७२८. सत्यजितं शपथयावनी सहमानां पुनःसराम्।
सर्वाः समह्ययोषधीरितो नः पारयादिति॥२॥

दोषों को दूर करने वाली ‘सत्यजित’, क्रोध को विनष्ट करने वाली ‘शपथ यावनी’, अभिचारों को सहने वाली ‘सहमाना’ तथा बार-बार रोगों को नष्ट करने वाली (अथवा विरेचक) ‘पुन:सरा’ आदि ओषधियों को हम प्राप्त करते हैं। वे इन रोगों से हमें तार दें॥२॥

७२९. या शशाप शपनेन याचं मूरमादधे।
या रसस्य हरणाय जातमारेभे तोकमत्तु सा॥३॥

जो पिशाचिनियाँ क्रोधित होकर शाप देती हैं और मूर्छित करने वाला पाप कर्म करती हैं तथा जो शरीर के रक्त को हरने के लिए नवजात शिशु को भी पकड़ लेती हैं, वे सब पिशाचिनियाँ अभिचार करने वाले शत्रु के ही पुत्र को खाएँ॥३॥

७३०. यां ते चक्रुरामे पात्रे यां चक्रुर्नीललोहिते।
आमे मांसे कृत्यां यां चक्रुस्तया कृत्याकृतो जहि॥४॥

हे कृत्ये! अभिचारकों ने जिस आभिचारिक प्रयोग को आपके लिए कच्चे मिट्टी के बर्तन में किया है, धुएँ से नीली और ज्वाला से लाल अग्नि स्थान में किया है तथा कच्चे मांस में किया है, उससे आप उन अभिचारकों का ही नाश करें॥४॥

७३१. दौष्वप्न्यं दौर्जीवित्यं रक्षो अभ्वमराय्यः।

दुर्णाम्नीः सर्वा दुर्वाचस्ता अस्मन्नाशयामसि॥५॥

अरिष्ट दर्शनरूपी बुरे स्वप्न को, दुःखदायी जीवन बिताने की स्थिति को, राक्षस जाति को, अभिचार क्रिया से उत्पन्न भारी भय को, निर्धनता बढ़ाने वाली अलक्ष्मियों को तथा बुरे नाम वाली समस्त पिशाचियों को हम इस पुरुष से दूर करते हैं॥५॥

७३२. क्षुधामारं तृष्णामारमगोतामनपत्यताम्।
अपामार्ग त्वया वयं सर्वं तदप मृज्महे॥६॥

हे अपामार्ग ओषधे! अत्यधिक भूख से मरना, अत्यधिक प्यास से मरना अथवा भूख-प्यास से मरना, वाणी अथवा इन्द्रियों के दोष तथा सन्तानहीनता आदि दोषों को हम आपके द्वारा दूर करते हैं॥६॥

७३३. तृष्णामारं क्षुधामारमथो अक्षपराजयम्।
अपामार्ग त्वया वयं सर्वं तदप मृज्महे॥७॥

प्यास से मरना, भूख से मरना तथा इन्द्रिय का नष्ट होना आदि समस्त दोषों को हे अपामार्ग ओषधे! आपकी सहायता से हम दूर करते हैं॥७॥

७३४. अपामार्ग ओषधीनां सर्वासामेक इद् वशी।
तेन ते मृज्म आस्थितमथ त्वमगदश्चर॥८॥

हे अपामार्ग ओषधे! आप समस्त ओषधियों को वशीभूत करने वाली अकेली ओषधि हैं। हे रोगिन् ! आपके रोगों को हम अपामार्ग ओषधि से दूर करते हैं॥८॥

– भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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