अथर्ववेद – Atharvaveda – 4:19 – अपामार्ग सूक्त

अथर्ववेद संहिता
अथ चतुर्थ काण्डम्

[१९ – अपामार्ग सूक्त]

[ ऋषि – शुक्र। देवता – अपामार्ग वनस्पति। छन्द – अनुष्टुप्, २ पथ्यापंक्ति।]

७४३. उतो अस्यबन्धुकृदुतो असि नु जामिकृत्।
उतो कृत्याकृतः प्रजां नडमिवा च्छिन्धि वार्षिकम्॥१॥

हे अपामार्ग ओषधे ! आप रिपुओं का विनाश करने वाली हैं। आप कृत्या का प्रयोग करने वाले रिपुओं की सन्तानों को वर्षा में पैदा होने वाली ‘नड़ (नरकुल) नामक’ घास के समान काटकर विनष्ट कर डालें ॥१॥

७४४. ब्राह्मणेन पर्युक्तासि कण्वेन नार्षदेन।
सेनेवैषि त्विषीमती न तत्र भयमस्ति यत्र प्राप्नोष्योषधे॥२॥

हे सहदेवि ! ‘नृषद’ के पुत्र कण्व नामक ब्राह्मण ने आपका वर्णन किया है। आप याजक की सुरक्षा के लिए तेजस्वी सेना के समान जाती हैं, अत: आप जहाँ गमन करती हैं, वहाँ अभिचारजन्य भय नहीं होता॥२॥

७४५. अग्रमेष्योषधीनां ज्योतिषेवाभिदीपयन्।
उत त्रातासि पाकस्याथो हन्तासि रक्षसः॥३॥

प्रकाश के द्वारा संसार को आलोकित करते हए सूर्यदेव जिस प्रकार ज्योतियों में सर्वश्रेष्ठ है, उसी प्रकार हे सहदेवि ! आप भी समस्त ओषधियों में श्रेष्ठ हैं। हे अपामार्ग ओषधे ! आप अपने बल के द्वारा कृत्या के दोषों को नष्ट करती हुई दुर्बलों की सुरक्षा करती है और राक्षसों का विनाश करती हैं॥३॥

७४६. यददो देवा असुरांस्त्वयाग्रे निरकुर्वत ।
ततस्त्वमध्योषधेऽपामार्गो अजायथाः॥४॥

हे ओषधे ! पूर्वकाल में इन्द्रादि देवों ने आपके द्वारा ‘राक्षसों’ को तिरस्कृत किया था। आप अन्य ओषधियों के ऊपर विद्यमान रहकर अपामार्ग रूप से पैदा होती है॥४॥

७४७. विभिन्दती शतशाखा विभिन्दन् नाम ते पिता।
प्रत्यग् विभिन्धि त्वं तं यो अस्माँ अभिदासति॥५॥

हे अपामार्ग ओषधे ! आप सैकड़ों शाखाओ वाली होकर ‘विभिन्दती’ नाम प्राप्त करती हैं। आपके पिता का नाम ‘विभिन्दन्’ है। अत: जो हमारे विनाश की कामना करते हैं. उन रिपुओं के सामने जाकर आप उनका विनाश करे ॥५॥

७४८. असद् भूम्याः समभवत् तद् यामेति महद् व्यचः।
तद् वै ततो विधूपायत् प्रत्यक् कर्तारमृच्छतु॥६॥

हे ओषधे ! आप असत् भूमि से उत्पन्न हैं, फिर भी आपकी महत्ता धुलोक तक संव्याप्त होती है। आप (कृत्या अभिचार) करने वाले के पास ही उसे निश्चित रूप से पहुँचा दें॥६॥

७४९. प्रत्यङ् हि सम्बभूविथ प्रतीचीनफलस्त्वम्।
सर्वान् मच्छपथाँ अधि वरीयो यावया वधम्॥७॥

हे अपामार्ग ओषधे ! आप प्रत्यक्ष फल वाली उत्पन्न हुई हैं। आप रिपुओं के आक्रोशों तथा उनके विस्तृत मारक-अस्त्रों को हमसे दूर करके उनके पास लौटा दें॥७॥

७५०. शतेन मा परि पाहि सहस्त्रेणाभि रक्ष मा।
इन्द्रस्ते वीरुधां पत उग्र ओज्मानमा दधत्॥८॥

हे सहदेवी ओषधे! रक्षा के सैकड़ों उपायों द्वारा आप हमारी सुरक्षा करें और हजारों उपायों द्वारा कृत्या के दोष से हमें बचाएँ। हे लतापति ओषधे ! प्रचण्ड बलशाली इन्द्रदेव हममें ओजस्विता स्थापित करें ॥८॥

– भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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