अथर्ववेद – Atharvaveda – 4:22 – अमित्रक्षयण सूक्त

अथर्ववेद संहिता
अथ चतुर्थ काण्डम्
[२२ – अमित्रक्षयण सूक्त]

[ ऋषि – वसिष्ट अथवा अथर्वा। देवता – इन्द्र और क्षत्रिय राजा। छन्द – त्रिष्टुप्।]

७६७. इममिन्द्र वर्धय क्षत्रियं म इमं विशामेकवृषं कृणु त्वम्।
निरमित्रानक्ष्णुह्यस्य सर्वांस्तान् रन्धयास्मा अहमुत्तरेषु॥१॥

हे इन्द्रदेव ! आप हमारे इस क्षत्रिय (शौर्यवान् रक्षक) को पुत्र-पौत्रों तथा सम्पत्ति आदि से समृद्ध करें और पराक्रमी मनुष्यों में इसे अद्वितीय बनाएँ। इसके समस्त रिपुओ को प्रभावहीन बनाकर आप इसके अधीन करें। ‘मैं श्रेष्ठ हूँ ‘ इसके प्रति ऐसा कहने वालों को (इसके) वश में करें॥१॥

७६८. एम भज ग्रामे अश्वेषु गोषु निष्टं भज यो अमित्रो अस्य।
वर्ष्म क्षत्राणामयमस्तु राजेन्द्र शत्रु रन्धय सर्वमस्मै॥२॥

हे इन्द्रदेव ! आप इस क्षत्रिय को जनसमूह, गौओं तथा अश्वों की सुविधाएँ पाने वाला बनाएँ और इसके रिपुओं को गौओं, अश्वों तथा मनुष्यों से पृथक रखें। यह क्षत्रिय गुणों की मूर्ति हो। इसके समस्त रिपुओं तथा राष्ट्रों को आप इसके अधीन करें॥२॥

७६९. अयमस्तु धनपतिर्धनानामयं विशां विश्पतिरस्तु राजा।
अस्मिन्निन्द्र महि वर्चासि धेह्यवर्चसं कृणुहि शत्रुमस्य॥३॥

यह राजा सोने, चाँदी आदि धन तथा प्रजाओं का स्वामी हो। हे इन्द्रदेव ! आप इस राजा में रिपुओं को पराजित करने वाला तेजस स्थापित करें॥३॥

७७०. अस्मै द्यावापृथिवी भूरि वामं दुहाथां धर्मदुघे इव धेनू।
अयं राजा प्रिय इन्द्रस्य भूयात् प्रियो गवामोषधीनां पशूनाम्॥४॥

हे द्यावा-पृथिवि! धारोष्ण दूध देने वाली गौओं की तरह आप इसे प्रचुर धन प्रदान करें। यह इन्द्र का स्नेह पात्र हो । (इन्द्र का प्रिय पात्र होने से वर्षा होने पर) यह गौओं, ओषधियों तथा पशुओं का भी प्रिय हो जाए॥४॥

७७१. युनज्मि त उत्तरावन्तमिन्द्रं येन जयन्ति न पराजयन्ते।
यस्त्वा करदेकवृषं जनानामुत राज्ञामुत्तमं मानवानाम्॥५॥

हे नर श्रेष्ठ! श्रेष्ठ गुणों वाले इन्द्रदेव को हम आपका मित्र बनाते हैं। उनके द्वारा प्रेरित आपके सहयोगी, रिपु सेना को विजित करें, वे कभी पराजित न हों। जो इन्द्रदेव वीरों तथा राजाओं में आपको वृषभ के समान प्रमुख बनाते हैं, ऐसे इन्द्रदेव से हम आपकी मैत्री कराते हैं॥५॥

७७२. उत्तरस्त्वमधरे ते सपत्ना ये के च राजन् प्रतिशत्रवस्ते।
एकवृष इन्द्रसखा जिगीवाञ्छत्रूयतामा भरा भोजनानि॥६॥

(हे वीर !) आप सर्वश्रेष्ठ हो और आपके रिपु निम्नकोटि के हों। जो शत्रु आपसे प्रतिकूल व्यवहार करते हैं, वे भी नीचे गिरें। इन्द्रदेव की मित्रता से आप अद्वितीय बलवान् बनकर शत्रुवत् आचरण करने वाले मनुष्यों के भोग-साधन, ऐश्वर्य आदि छीन लाएँ॥६॥

७७३. सिंहप्रतीको विशो अद्धि सर्वा व्याघ्रप्रतीकोऽव बाधस्व शत्रून्।
एकवृष इन्द्रसखा जिगीवाञ्छत्रूयतामा खिदा भोजनानि॥७॥

(हे राजन् !) सिंह के समान पराक्रमी बनकर आप अपनी प्रजाओं से भोग-साधन आदि प्राप्त करें और देव व्याघ्र के समान बलशाली बनकर अपने रिपुओं को संतप्त करें। आप इन्द्रदेव की मित्रता से अद्वितीय बलवान् बनकर, शत्रुवत् व्यवहार करने वालों के धन को विनष्ट करने में सक्षम हो॥७॥

– भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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