अथर्ववेद – Atharvaveda – 4:27 – पापमोचन सूक्त

अथर्ववेद संहिता
अथ चतुर्थ काण्डम्

[२७ – पापमोचन सूक्त]

[ ऋषि – मृगार। देवता – मरुद्गण। छन्द – त्रिष्टुप्।]

८०२. मरुतां मन्वे अधि मे बुवन्तु प्रेमं वाजं वाजसाते अवन्तु।
आशूनिव सुयमानह्व ऊतये ते नो मुञ्चन्त्वंहसः॥१॥

हम मरुतों के माहात्म्य को जानते हैं, वे हमें अपना कहे और हमारे अन्न की सुरक्षा करते हुए हमारे बल को भी रणक्षेत्र में सुरक्षित रखें। चलने वाले श्रेष्ठ घोड़ों के समान हम उन मरुतों को अपनी सुरक्षा के लिए बुलाते हैं। वे हमें समस्त पापों से मुक्त करें॥१॥

८०३. उत्समक्षितं व्यचन्ति ये सदा य आसिञ्चन्ति रसमोषधीषु।
पुरो दधे मरुतः पृश्निमातॄस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः॥२॥

जो मरुद्गण मेघों को आकाश में फैलाते हैं और ब्रीहि जौ, तरुगुल्म आदि ओषधियों को वृष्टि जल से सींचते हैं, उन ‘पृश्नि’ माता वाले मरुतों की हम प्रार्थना करते हैं, वे हमें समस्त पापों से मुक्त करें॥२॥

८०४. पयो धेनूनां रसमोषधीनां जवमर्वतां कवयो य इन्वथ।
शग्मा भवन्तु मरुतो नः स्योनास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः॥३॥

हे मरुद्देवो! आप जो क्रान्तदर्शी होकर गौओं के दुग्ध तथा ओषधियों के रस को समस्त शरीर में संव्याप्त करते हैं तथा अश्वों में वेग को संव्याप्त करते हैं, ऐसे आप सब हमें सामर्थ्य तथा सुख प्रदान करने वाले हों और हमें समस्त पापों से छुड़ाएँ॥३॥

८०५. अपः समुद्राद् दिवमुद् वहन्ति दिवस्पृथिवीमभि ये सृजन्ति।
ये अद्भिरीशाना मरुतश्चरन्ति ते नो मुञ्चन्त्वंहसः॥४॥

जो मरुद्गण जल को समुद्र से अन्तरिक्ष तक पहुँचाते हैं और अन्तरिक्ष से पृथ्वी को लक्ष्य करके पुन: छोड़ते हैं, वे जल के साथ विचरण करने वाले जल के स्वामी मरुद्गण हमें समस्त पापों से मुक्त करें॥४॥

८०६. ये कीलालेन तर्पयन्ति ये घृतेन ये वा वयो मेदसा संसृजन्ति।
ये अद्भिरीशाना मरुतो वर्षयन्ति ते नो मुञ्चन्त्वंहसः॥५॥

जो मरुद्गण अन्न और जल द्वारा समस्त मनुष्यों को तृप्त करते हैं, जो अन्न को पुष्टिकारक पदार्थों के साथ पैदा करते हैं तथा जो मेघ स्थित जल के अधिपति बनकर सब जगह वृष्टि करते हैं, वे मरुद्गण हमें समस्त पापों से मुक्त करें॥५॥

८०७. यदीदिदं मरुतो मारुतेन यदि देवा दैव्येनेदगार।
यूयमीशिध्वे वसवस्तस्य निष्कृतेस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः॥६॥

सबको आवास देने वाले हे दिव्य मरुतो! देवताओं से सम्बन्धित अपराध के कारण हम जो दुःख पा रहे हैं, उस दुःख अथवा पाप को दूर करने में आप ही सक्षम हैं। आप हमें समस्त पापों से मुक्त करें॥६॥

८०८. तिग्ममनीकं विदितं सहस्वन् मारुतं शर्धः पृतनासूग्रम्।
स्तौमि मरुतो नाथितो जोहवीमि ते नो मुञ्चन्त्वंहसः॥७॥

सेना के सदृश मरुतों का तीक्ष्ण तथा प्रचण्ड बल रणक्षेत्र में दुःसह होता है। हम ऐसे मरुतों की प्रार्थना करते हुए, उन्हें आहूत करते हैं। वे हमें समस्त पापों से मुक्त करें ॥७॥

– वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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