अथर्ववेद – Atharvaveda – 4:34 – ब्रह्मौदन सूक्त

अथर्ववेद संहिता
अथ चतुर्थ काण्डम्

[३४- ब्रह्मौदन सूक्त]

[ ऋषि – अथर्वा। देवता – ब्रह्मौदन। छन्द – त्रिष्टुप्, ४ उत्तमा भुरिक् त्रिष्टुप् ५ त्र्यवसाना सप्तपदा कृति, ६ पञ्चपदातिशक्वरी, ७ भुरिक् अतिशक्वरी, ८ जगती।]

इस सूक्त के देवता ‘ब्रह्मौदन’ हैं। लौकिक संदर्भ में यज्ञीय क्रम में संस्कारयुक्त जो अन्न दान किया जाता है, उसे ब्रह्मौदन कहते हैं। पके हुए भोज्य पदार्थ, बिना पकाये भोज्य(दही, शहद, घृतादि) पदार्थ तथा सूखे अन्न भी यज्ञीय ऊर्जा से संस्कारित करके दिये जाने की परम्परा रही है। यज्ञीय-ब्राह्मी संस्कार युक्त इस सेवन के भी महत्त्वपूर्ण लाभ कहे गये हैं; किन्तु सूक्ष्म सन्दर्भ में ‘रेतो वा ओदनः ‘(श०ब्रा० १३.१.१४.४) जैसे सूत्रों के अनुसार वह बहुत व्यापक तत्त्व है। ब्रह्मौदन का अर्थ ब्रह्म का उत्पादक तेजस् होता है। ब्रह्म ने सृष्टि सृजन यज्ञ के लिए अपने तेजस् का एक अंश परिपक्व किया। जिस तरह अन्नमयकोश के पोषण एवं विकास के लिए अन्न आवश्यक है, उसी तरह सृष्टि के मूल घटकों के लिये ब्रह्मौदन सृष्टिकारक तेजस् की भूमिका मानी जा सकती है। ब्रह्मवर्चस इसी के धारण-सेवन करने से विकसित होता है। इस सूक्त तथा अगले सूक्त के मंत्रों में ब्रह्मौदन की जो महत्ता बतलायी गयी है, वह स्थूल अन्न की अपेक्षा ऐसी ही व्यापक अवधारणा का पोषण करती है-

८५३. ब्रह्मास्य शीर्षं बृहदस्य पृष्ठं वामदेव्यमुदरमोदनस्य।
छन्दांसि पक्षौ मुखमस्य सत्यं विष्टारी जातस्तपसोऽधि यज्ञः॥१॥

इस ओदन (बह्मौदन) का शीर्ष भाग ब्रह्म है, पृष्ठभाग बृहत् (विशाल) है, वामदेव (ऋषि अथवा उत्पादक सामर्थ्य) से सम्बन्धित इसका उदर है, विविध छन्द इसके पार्श्वभाग हैं तथा सत्य इसका मुख है। विस्तार पाने वाला यह यज्ञ तप से उत्पन्न हुआ है॥१॥

८५४. अनस्था: पूताः पवनेन शुद्धाः शुचयः शुचिमपि यन्ति लोकम्।
नैषां शिश्नं प्रदहति जातवेदाः स्वर्गे लोके बहु स्त्रैणमेषाम्॥२॥

यह (ब्रह्मौदन) अस्थिरहित (कोई भी इच्छित आकार लेने में सक्षम) और पवित्र है। वायुसे (शरीर में प्राणायाम आदि के द्वारा) शुद्ध और पवित्र होकर यह पवित्र लोकों को ही प्राप्त होता है। अग्नि इसके शिश्न (उत्पादक अंग) को नष्ट नहीं करता। स्वर्ग में (इसका तेजस् धारण करने वाली) इसकी बहुत सी स्त्रियाँ (उत्पादक शक्तियाँ।) हैं॥२॥

[लौकिक संदर्भ में यज्ञ से संस्कारित अन्न के दिव्य संस्कार अग्नि पर पकाने से नष्ट नहीं होते। हव्य बनकर यह ऊर्ध्व लोकों में जाकर अनेक उर्वर शक्तियों को अपना तेजस् प्रदान करता है। सूक्ष्म संदर्भ में यह कोई भी रूप लेने में समर्थ तेजस, पवित्र होता है तथा पवित्र माध्यमों द्वारा ही ग्रहणीय है। इसका प्रभाव अग्नि आदि के सम्पर्क से कम नहीं होता।]

८५५. विष्टारिणमोदनं ये पचन्ति नैनानवतिः सचते कदाचन।
आस्ते यम उप याति देवान्त्सं गन्धर्वैर्मदते सोम्येभिः॥३॥

जो (साधक) इस विस्तारित होने वाले ओदन(स्थूल या सूक्ष्म अन्न) को पकाते (प्रयोग में लाने योग्य परिपक्व बनाते) हैं, उन्हें कभी दरिद्रता नहीं व्यापती। वे यम(जीवन के दिव्य अनुशासनों) में स्थित रहते हैं, देवों की निकटता प्राप्त करते हैं तथा सोम-पान योग्य गंधर्वादि के साथ आनन्दित होते हैं॥३॥

[ब्रह्मौदन-सृष्टि को आकार देने वाला तेजस् का संचरण विश्व में सतत होता रहता है। जिस क्षेत्र या काया में बहकर्म यज्ञादि साधनाओं की ऊष्मा होती है, वहाँ उसके संसर्ग से वह पके अन्न की तरह उपयोगी होकर लाभ पहुँचाता है। ब्रह्मतेजस् पकता है, तो साधक इन्द्रियादि को अपने नियंत्रण में (यम में) रखने में समर्थ होता है और उसे देव अनुग्रह प्राप्त होता है। यज्ञादि अनुष्ठानों से उत्पन्न दिव्य ऊर्जा को अन्न के माध्यम से वितरित करने का प्रयास करने वाले स्थूल ब्रह्मौदन पकाने वालों को भी देव अनुग्रह प्राप्त होता है।]

८५६. विष्टारिणमोदनं ये पचन्ति नैनान् यमः परि मुष्णाति रेतः।
रथी ह भूत्वा रथयान ईयते पक्षी ह भूत्वाति दिवः समेति॥४॥

जो याजक इस अन्न को पकाते हैं, यमदेवता उनको वीर्यहीन नहीं करते। वे अपने जीवनपर्यन्त रथ पर आरूढ़ होकर पृथ्वी पर विचरण करते हैं और पक्षी के सदृश बनकर द्युलोक को अतिक्रमण करके ऊपर गमन करते हैं ॥४॥
[ याजक को यज्ञ से लौकिक एवं पारलौकिक दोनों सद्गतियाँ प्राप्त होती हैं।]

८५७. एष यज्ञानां विततो वहिष्ठो विष्टारिणं पक्त्वा दिवमा विवेश। आण्डीकं कुमुदं सं तनोति बिसं शालूकं शफको मुलाली।
एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत् पिन्वमाना उप त्वा तिष्ठन्तु पुष्करिणीः समन्ताः॥५॥
यह यज्ञ समस्त यज्ञों में श्रेष्ठ है। इस अन्न को पकाकर याजकगण स्वर्गलोक में प्रविष्ट होते हैं। (यह यज्ञ) अण्ड में स्थित मूलशक्ति को, शान्तचित्त से, कमलनाल की तरह (तीव्र गति से) विस्तारित करता है। (हे साधक !) ये सब धाराएँ (इसके माध्यम से) तुम्हें प्राप्त हों। स्वर्ग की मधुर रसवाहिनी दिव्य नदियाँ तुम्हारे पास आएँ॥५॥

८५८. घृतहृदा मधुकूलाः सुरोदकाः क्षीरेण पूर्णा उदकेन दध्ना। एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत् पिन्वमाना उप त्वा तिष्ठन्तु पुष्करिणी: समन्ताः॥६॥
हे सव (सोमयज्ञ) के अनुष्ठानकर्ता ! घृत के प्रवाह वाली, शहद से पूर्ण किनारों वाली, निर्मल जल वाली, दुग्ध, जल और दही से पूर्ण समस्त धाराएँ मधुरतायुक्त पदार्थों को पुष्ट करती हुईं, द्युलोक में आपको प्राप्त हो॥६॥

८५९. चतुरः कुम्भांश्चतुर्धा ददामि क्षीरेण पूर्णी उदकेन दध्ना। एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत् पिन्वमाना उप त्वा तिष्ठन्तु पुष्करिणीः समन्ताः॥७॥
दूध, दही और जल से पूर्ण चार घड़ों को हम चार दिशाओं में स्थापित करते हैं। स्वर्गलोक में दुग्ध आदि की धाराएँ मधुरता को पुष्ट करती हुई आपको प्राप्त हों और जल से पूर्ण सरिताएँ भी आपको प्राप्त हों॥७॥

८६०. इममोदनं निदधे ब्राह्मणेषु विष्टारिणं लोकजितं स्वर्गम्।
स मे मा क्षेष्ट स्वधया पिन्वमानो विश्वरूपा धेनुः कामदुधा मे अस्तु॥८॥

यह विस्तारित होने वाला स्वर्गीय ‘ओदन’ हम ब्राह्मणों (ब्रह्मनिष्ठ साधकों) में स्थापित करते हैं, यह ओदन स्वधा से दुग्ध आदि के द्वारा वर्द्धित होने के कारण नष्ट न हो और अभिलषित फल प्रदान करने वाली कामधेनु के रूप में परिणत हो जाए ॥८॥

– वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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