अथर्ववेद – Atharvaveda – 4:35 – ब्रह्मौदन सूक्त

अथर्ववेद संहिता
अथ चतुर्थ काण्डम्

[३५ – मृत्युसंतरण सूक्त]

[ ऋषि – प्रजापति। देवता – अतिमृत्यु। छन्द – त्रिष्टुप, ३ भुरिक् त्रिष्टुप. ४ जगती।]

८६१. यमोदनं प्रथमजा ऋतस्य प्रजापतिस्तपसा ब्रह्मणेऽपचत्।
यो लोकानां विधुति भिरेषात् तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्॥१॥

जिस ओदन को सर्वप्रथम उत्पन्न प्रजापति ने तपस्या के द्वारा अपने कारण ब्रह्म के लिए बनाया था, जिस प्रकार नाभि समस्त जीवों को विशेष रूप से धारण करने वाली है, उसी प्रकार वह ओदन पृथ्वी आदि को धारण करने वाला है। उस ओदन के द्वारा हम मृत्यु को लांघते हैं॥१॥

८६२. येनातरन् भूतकृतोऽति मृत्यु यमन्वविन्दन् तपसा श्रमेण।
यं पपाच ब्रह्मणे ब्रह्म पूर्वं तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्॥२॥

जिस अन्न को तपश्चर्या द्वारा भूतों के सृष्टिकर्ता देवताओं ने प्राप्त किया है, जिसके द्वारा वे मृत्यु का अतिक्रमण कर गये तथा जिसको पहले उत्पन्न ‘ब्रह्म’ ने अपने कारण ‘ब्रह्म’ के लिए पकाया; उस अन्न के द्वारा हम मृत्यु को लांघते हैं॥२॥

८६३. यो दाधार पृथिवीं विश्वभोजसं यो अन्तरिक्षमापृणाद् रसेन।
यो अस्तभ्नाद् दिवमूध्वों महिम्ना तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्॥३॥

जो ओदन समस्त प्राणियों को भोजन प्रदान करने वाली पृथ्वी को धारण करता है, जो ओदन अपने रस के द्वारा अन्तरिक्ष को परिपूर्ण करता है तथा जो ओदन अपने माहात्म्य के द्वारा द्युलोक को ऊपर ही धारण किये रहता है, उस ओदन के द्वारा हम मृत्यु का अतिक्रमण करते हैं ॥३॥

८६४. यस्मान्मासा निर्मितास्त्रिंशदराः संवत्सरो यस्मानिर्मितो द्वादशारः।
अहोरात्रा यं परियन्तो नापुस्तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्॥४॥

जिस ब्रह्म सम्बन्धी ओदन से बारह महीने उत्पन्न हुए हैं, जिससे रथचक्र के ‘अरे’ रूप तीस दिन उत्पन्न हुए हैं, जिससे बारह महीने वाले संवत्सर उत्पन्न हुए हैं तथा जिस ओदन को व्यतीत होते हुए दिन और रात प्राप्त नहीं कर सकते, उस ओदन के द्वारा हम मृत्यु का उल्लंघन करते हैं॥४॥

८६५. यः प्राणदः प्राणदवान् बभूव यस्मै लोका घृतवन्तः क्षरन्ति।
ज्योतिष्मती: प्रदिशो यस्य सर्वास्तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्॥५॥

जो ओदन मरणासत्रों को प्राण प्रदान करने वाला होता है, जिसके लिए समस्त जगत् घृत-धाराओं को प्रवाहित करता है तथा जिसके ओजस से समस्त दिशाएँ ओजस्वी बनती हैं, उस ओदन के द्वारा हम मृत्यु का अतिक्रमण करते हैं॥५॥

८६६. यस्मात् पक्वादमृतं सम्बभूव यो गायत्र्या अधिपतिर्बभूव।
यस्मिन् वेदा निहिता विश्वरूपास्तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्॥६॥

जिस पके हुए ओदन से द्युलोक में स्थित अमृत उत्पन्न हुआ, जो गायत्री छन्द का देवता हुआ तथा जिसमें समस्त प्रकार के ऋक्, यजु, साम आदि वेद निहित हैं, उस ओदन के द्वारा हम मृत्यु का उल्लंघन करते हैं॥६॥

८६७. अव बाधे द्विषन्तं देवपीयुं सपत्ना ये मेऽप ते भवन्तु।
ब्रह्मौदनं विश्वजितं पचामि शृण्वन्तु मे श्रद्दधानस्य देवाः॥७॥

विद्वेष करने वाले रिपुओं तथा देवत्व-हिंसकों के कार्य में हम बाधा डालते हैं। हमारे शत्रु विनष्ट हो जाएँ, इसीलिए सबको विजित करने वाले ब्रह्मरूप ओदन पकाते हैं। अत: समस्त देवता हमारी पुकार को सुनें ॥७॥

– वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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